शुक्रवार, 23 जून, 2006 को 20:31 GMT तक के समाचार
भारत में आपराधिक दंड संहिता में संशोधन किया गया है. माना जा रहा है कि इससे लंबित मामलों के निपटारे में होने वाली देरी कम होगी.
संशोधनों के मुताबिक़ अगर कोई भी विचाराधीन क़ैदी संभावित सज़ा का आधा समय यदि फ़ैसले के इंतज़ार में जेल के भीतर काट लेता है तो वह रिहाई की अपील कर सकता है.
संशोधन के अनुसार न्यायालय को उस व्यक्ति को तुरंत राहत मुहैया करानी होगी.
इस नई धारा 436 ए के दायरे से केवल वही लोग बाहर रह सकेंगे जिसे मृत्युदंड मिलने के आसार हैं.
इस बारे में पत्रकारों को जानकारी देते हुए केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने कहा, "हालांकि इससे लंबित मामलों से संबंधित सारी समस्याएँ हल नहीं हो जाएँगी पर वर्षों से विचाराधीन पड़े मामलों के निपटारे में कुछ तेज़ी ज़रूर आएगी."
प्रतिक्रियाएँ
इस संशोधन का स्वागत करते हुए जानी-मानी पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने कहा, "इस तरह के संशोधन के बाद पुलिस, न्यायपालिका, जेलों और समाज सभी पर दबाव बनेगा क्योंकि इस दिशा में अभी तक सार्थक पहल नहीं हुई है."
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस जेएस वर्मा ने इस कानून के लागू होने के बारे में कहा कि इतना भर करना ही पर्याप्त नहीं है.
उन्होंने कहा, "हालांकि देर आए, दुरुस्त आए जैसी स्थिति है पर इतना ही काफ़ी नहीं है. जेलों में बिना ज़मानत के पड़े लोगों पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है."
इसके अलावा संशोधनों में यह भी कहा गया है कि सूरज ढलने के बाद और सूर्योदय से पहले किसी भी महिला को गिरफ़्तार नहीं किया जा सकेगा.
पुलिस अगर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करती है तो कुछ अपवादों को छोड़कर बाक़ी स्थितियों में पुलिस को यह जानकारी देनी होगी कि उस व्यक्ति को कहाँ रखा गया है.