बुधवार, 21 जून, 2006 को 14:10 GMT तक के समाचार
पाणिनी आनंद
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के कामकाज से असंतोष ज़ाहिर करते हुए इसकी सदस्यता छोड़ दी है.
अरुणा रॉय का कहना है कि केंद्र सरकार या तो राष्ट्रीय सलाहकार परिषद जैसा कोई अन्य मंच तैयार करे या फिर इसी को और प्रभावी बनाने के प्रयास करे.
देशभर में सूचना के अधिकार के अभियान की नेत्री रहीं अरुणा रॉय पिछले दो वर्षों से राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य थीं.
लेकिन बुधवार को प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर उन्होंने ख़ुद को इससे अलग कर लिया है.
इससे पहले ज़्याँ द्रेज़ ने पिछले वर्ष ही परिषद की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया था.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि परिषद की अध्यक्ष सोनिया गांधी पहले ही इस्तीफ़ा दे चुकी हैं और इसकी पिछले कुछ महीनों से कोई बैठक भी नहीं हुई है. ऐसे में इस परिषद में बने रहने से ज़्यादा ज़रूरी यह है कि वो लोगों के बीच जाकर काम करें.
ग़ौरतलब है कि वर्ष 2004 में यूपीए सरकार के गठन के बाद इस राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का गठन किया गया था जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी थी पर इसी वर्ष लाभ का पद मामले पर विवाद के बाद उन्होंने इसके अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.
हालांकि अरुणा रॉय ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मंचों की प्रासंगिकता ख़त्म नहीं हुई है.
उन्होंने कहा, "न्यूनतम साझा कार्यक्रम की प्रासंगिकता तो बनी ही रहेगी और उसे अमल में लाने के लिए और कई मंचों से प्रयास किए जा सकते हैं."
अरुणा रॉय ने देश में सूचना का अधिकार कानून और राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी कानून के लागू होने को इस मंच की एक बड़ी सफलता बताया.
उल्लेखनीय है कि प्रति वर्ष राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्यों की सदस्यता का नवीनीकरण होता है पर इस बार अरुणा रॉय ने अपनी सदस्यता के लिए ऐसा किए जाने से मना कर दिया है.
उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में कहा है कि दो वर्षों में सूचना के अधिकार और काम के अधिकार के मुद्दे पर दो अच्छे क़ानून बने हैं और अब इनपर लोगों के बीच जाकर काम करने की ज़रूरत है इसलिए वो सलाहकार परिषद में अपनी सदस्यता को जारी नहीं रखना चाहतीं.
जाने माने अर्थशास्त्री और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य रहे प्रोफ़ेसर ज़्याँ द्रेज़ ने पिछले वर्ष ही परिषद की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया था.