सोमवार, 19 जून, 2006 को 15:01 GMT तक के समाचार
विनोद वर्मा
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
मंत्री बन जाना भर पर्याप्त नहीं होता. बड़े बंगले और लालबत्ती की गाड़ी से ही मन नहीं भरता.यक़ीन न हो तो केंद्र में राज्यमंत्री बने लोगों से पूछ लीजिए.
अगर ऐसा न होता तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इन बेचारों की सिफ़ारिश क्यों करनी पड़ती.
क्यों उन्हें अपने कैबिनेट मंत्रियों से कहना पड़ता कि वे अपने विभाग के राज्य मंत्रियों को भी काम दें.
अब प्रधानमंत्री ने कह दिया है तो मंत्रालयों में सुगबुगाहट शुरु हो गई है. राज्यमंत्री थोड़े उत्साहित हैं. वे अपने विभागों के सचिवों से संपर्क साध रहे हैं. काम के बँटवारे में सचिव की भूमिका बड़ी होगी.
सचिव से पूछकर ही बड़े मंत्री (राज्यमंत्रियों के कार्यालयों में कैबिनेट मंत्री को इसी तरह पुकारा जाता है) काम बाँटेंगे न.
देखें, किसे क्या मिलता है. सच में काम मिलता है या फिर झुनझुना पकड़ा दिया जाता है.
वैसे ये कोई नई समस्या नहीं है. और ऐसा भी नहीं है कि यूपीए के कैबिनेट मंत्री ही अपने राज्यमंत्री के साथ सौतेला व्यवहार कर रहे हैं.
ये समस्या कमोबेश हर सरकार में होती है. एनडीए की वाजपेयी सरकार को ही ले लीजिए.
उनकी सरकार में तो राज्यमंत्रियों की गति तो देखते ही बनती थी.यहाँ तक की कार्यालय में जाकर बैठने लायक भी काम नहीं होता था.
सुमित्रा महाजन उन दिनों मुरली मनोहर जोशी की राज्यमंत्री थीं. उनके घर पर एक दिन एनडीए के तमाम राज्यमंत्रियों की एक बैठक बुलाई गई.
बैठक में तय हुआ कि प्रधानमंत्री अटलजी के पास चलकर राज्यमंत्रियों का दुखड़ा सुनाया जाए. साथ में ब्रजेश मिश्रा जी को भी, क्योंकि कैबिनेट मंत्रियों को फ़ोन तो वही करने वाले थे.
अटल जी की ओर से ब्रजेश मिश्रा ने कई कैबिनेट मंत्रियों को फ़ोन किया.
कुछ राज्यमंत्रियों को उनके कैबिनेट मंत्रियों ने काम दिया था. लेकिन उसे सुनकर हँसी आती थी कि ये भी कोई काम हुआ भला.
मुरासोली मारन उन दिनों उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री हुआ करते थे. उनके दो राज्यमंत्री थे. एक उमर फ़ारुक़ और दूसरे रमन सिंह. वही रमन सिंह जो इन दिनों छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री हैं.
उमर फ़ारुक़ तो ख़ैर वज़नदार मंत्री थे और उनके पास ढेर सारा काम था और एक तरह से उद्योग का काम मारन ख़ुद देखते थे और उमर वाणिज्य का ज़्यादातर काम.
रमन सिंह के पास सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी थी संसद में मंत्रालय से जुड़े सवालों के जवाब देने का. इसके अलावा वो इलायची बोर्ड, रबर बोर्ड जैसे कई बोर्डों का काम देखा करते थे.
उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक जब केंद्र में इस्पात और खान मंत्री थे तो उनके राज्यमंत्री से तनाव ऐसा बढ़ गया था कि ख़ुद प्रधानमंत्री को बीच-बचाव के लिए आना पड़ा था.
कई कैबिनेट मंत्रियों को आदेश देते मैंने देखा है कि कोई भी फ़ाइल राज्यमंत्री को न भेजी जाए.
सचिव से लेकर संयुक्त सचिव तक सभी को ये सुविधाजनक भी लगता है कि एक ही मंत्री से निपटते रहो. दो मंत्री यानी दो बोझ.
आख़िर काम तो उन्हें ही करना है. मंत्री तो सिर्फ़ गुणाभाग करते रहते हैं और जब सब मामला जम जाता है तो चिड़िया भर बिठाते हैं.
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नया पता
खजुराहो और कोणार्क के मंदिर हों या फिर ताजमहल, एक सवाल बार-बार ज़हन में उठता था कि उस समय जब साधन-संसाधन पर्याप्त न थे तब तो ऐसा अद्भुत निर्माण कार्य हुआ कि आज भी आश्चर्य होता है, लेकिन अब क्यों ऐसा नहीं होता?
लगता था कि इतनी आधुनिक मशीनें हैं, तरह-तरह के साधन हैं और डिज़ाइनिंग के लिए कंप्यूटर तब तो कोई ऐसा निर्माण हो जो पुरानी धरोहर के बराबर खड़ा हो सके.
दिल्ली में यमुना के किनारे बना अक्षरधाम मंदिर एक हद तक इसका जवाब दिखता है.
मैं मंदिर नहीं जाता लेकिन इसकी भव्यता और इससे जुड़े विवादों ने मुझे वहाँ जाने पर मजबूर किया.
यक़ीन मानिए, उस मंदिर के लिए दो या तीन घंटे कम ही पड़ते हैं. हर कोना इतना ख़ूबसूरत लगता है कि घंटों निहारते रहें. पत्थरों को इतनी बारीकी से तराशा गया है और ऐसी कलाकृतियाँ हैं कि मन कलाकारों के लिए श्रद्धा से भर जाता है.
और फिर हर शाम वहाँ आयोजित होने वाला संगीतमय फ़ौव्वारे का कार्यक्रम. हालांकि वो सब आधुनिक तकनीक और संयोजन भर का मामला है लेकिन है वो भी दर्शनीय.
इस बात को लेकर विवाद हैं कि 100 एकड़ में फैला 200 करोड़ रुपयों का ये मंदिर क्या मंदिर अवैध निर्माण है,या फिर किसी मंदिर पर इतना पैसा ख़र्च करना भारत जैसे देश में ठीक है?
मृदुला गर्ग से लेकर राजेंद्र यादव तक कई बुद्धिजीवी इस मंदिर के ख़िलाफ़ खड़े दिखते हैं.
लेकिन इस बात पर कोई विवाद नहीं कि इन दिनों अक्षरधाम मंदिर राजधानी दिल्ली में पर्यटन का नया पता है.
अगर आपको दिल्ली जाने में सिर्फ़ इस बात के लिए उकताहट होती है कि जामा मस्जिद और लोटस टेम्पल को, या क़ुतुबमीनार और जंतरमंतर को कितनी बार देखेंगे, तो एक बार इस मंदिर को देखने दिल्ली जाना चाहिए.
और मंदिर देखने के बाद पीछे भोजनालय में 20 रुपए खर्च करके स्वादिष्ट खिचड़ी खाना मत भूलिएगा.
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पुलिसिया जवाब
एक मित्र के भतीजे ने उत्तरप्रदेश पुलिस में भर्ती होने के लिए इंटरव्यू दिया.
इंटरव्यू की बारी आते आते रात के डेढ़ बज गए थे. एक साथ पंद्रह लोगों को बुलाकर इंटरव्यू लिया.
मित्र ने अपने भतीजे से विवरण पूछे.
क्या पूछा- पूछा कि पुलिस में भर्ती क्यों होना चाहते हो?
क्या जवाब दिया- सबने कहा कि अपराध रोकने और आतंकवाद से लड़ने के लिए.
तुमने क्या कहा-मैंने भी यही कहा.
और-पूछा कि पंजाब का नाम पंजाब क्यों पड़ा?
क्या कहा-सबने कहा वहाँ पाँच नदियाँ हैं इसलिए.
और तुमने- मैंने भी यही कहा.
और कोई सवाल- फिर पूछा कि कौन सी पाँच नदियाँ हैं?
फिर- सबने कहा गंगा.
और तुमने क्या जवाब दिया-सबने कहा कि गंगा तो मैंने भी यही कहा कि गंगा है.
भोजपुरी में हो रहे इस वार्तालाप के बाद पत्रकार मित्र ने लंबी से साँस ली.
फिर वो ख़ुद को समझाते रहे. बहुमत के साथ रहना लोकतांत्रिक होने की निशानी है. और पुलिस के लिए तो जो ज़्यादा लोग कह रहे हों वही सबूत है.
क़ानून सबूत माँगता है. और जब पंद्रह में से ज़्यादातर लोगों ने कहा कि गंगा पंजाब में है तो फिर गंगा की क्या मजाल कि वहाँ न हो.
(हमारी साप्ताहिक दिल्ली डायरी की यह शुरुआत आपको कैसी लगी? लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर).