मंगलवार, 13 जून, 2006 को 08:14 GMT तक के समाचार
शुभ्रांशु चौधरी
चंदौली से लौटकर
बिहार की सीमा पर बोदलपुर, उत्तरप्रदेश का एक गाँव है जो एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ एक ओर सरकार है और दूसरी ओर नक्सली.
सरकार मदद का आश्वासन दे रही है और गाँव वाले उसकी प्रतीक्षा भी कर रहे हैं लेकिन दूसरी ओर नक्सली सरकार के ख़िलाफ़ गाँव वालों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं.
पता नहीं कब गाँव वाले इस दोराहे पर से किस मोड़ पर जाना तय कर लेंगे.
बोदलपुर की आबादी 2500 की है. इस गांव में 714 हेक्टेयर ज़मीन है जो नदी किनारे है और इसी के कारण यहाँ बहुत अच्छी खेती होती है.
पर भारत के आम गांवों की तरह यहां भी ज़मीन का मालिकाना हक सिर्फ 20 प्रतिशत लोगों के पास है. शेष मज़दूर हैं.
ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना की स्थिति देखने के लिए वहाँ जाने पर पता चला कि बोदलपुर के सारे ग्रामीणों ने इस योजना के तहत अपना कार्ड बनवा लिए हैं और गांव के पास ही एक बाँध बनाने के लिये अर्ज़ी भी दे दी है.
ग्रामीणों में इस योजना को लेकर बड़ा उत्साह भी है.
गाँव वाले कहते हैं, “अगले 5 साल तक क्या क्या काम करना है उसकी सूची हमने बना ली है और यदि ये काम यहाँ होता है तो किसी को भी अब काम की तलाश में बाहर नहीं जाना पड़ेगा”.
पर अर्ज़ी देने के बावजूद बोदलपुर के लोगों को अब तक काम नहीं मिल पाया है.
विकासखंड के विकास अधिकारी ने बताया है कि पूरे ज़िले के लिये इस योजना के तहत 15 लाख रूपए ही आए हैं और अकेले इस गांव ने ही 15 लाख के काम की अर्जी डाल दी है.
ग्रामीणों को यह पता नहीं था कि इस क़ानून के तहत अगर प्रशासन 15 दिन के भीतर काम नहीं देता है तो वे बेरोज़गारी भत्ता के पात्र होंगे.
नई समस्या
लेकिन समस्या इतनी भर नहीं है.
भूमिहीन ग्रामीण नदी की दूसरी ओर जंगल में और नदी के सूखे रहने पर उसके तट पर खेती किया करते थे.
गाँव वाले बताते हैं कि अब जंगल विभाग वाले खेती करना तो दूर जंगल में गाय चराने जाने पर माँगते हैं और पैसे की मांग करते हैं.
उनका कहना है कि जंगल की खाली पड़ी ज़मीन पर यदि उन्हें खेती करने का अधिकार मिल जाए तब भी सारी समस्या हल हो जायेगी.
और इसी से जुड़ा समस्या का एक दूसरा पहलू भी है.
ग्रामीण बताते हैं, “जंगल में आजकल एक नई समस्या आ गई है. आजकल वहाँ जाने पर नक्सली मिल जाते हैं. वे हमें बताते हैं कि वे हमारी मदद के लिये यहां आए हैं और प्रशासन के ख़िलाफ़ हमारी लड़ाई लड़ना चाहते हैं.”
उनका कहना है कि “अब गांव में पुलिस भी आने लगी है. वह हम पर नक्सलियों का समर्थक होने का आरोप लगाती है. हमारे गाँव के तीन लड़कों को बेकार में पिछले एक साल से जेल में बन्द कर रखा है, उनके मां बाप परेशान हैं पर उनकी कोई सुनवाई नहीं है”.
एक सामाजिक कार्यकर्ता जो ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के तहत काम दिलाने के लिये बोदलपुर के ग्रामीणों की मदद करना चाहते थे और इसी सिलसिले में उनसे तमाम कागज़ात इकट्ठा कर रहे थे, नक्सलियों की चर्चा सुनकर कहा, “यदि आप नक्सलियों का साथ देंगे तो मैं आपकी कोई मदद नहीं करुँगा.”
लेकिन सभा में बिल्कुल सन्नाटा था. किसी ने नहीं कहा कि वे नक्सली के साथ नहीं जा रहे हैं.
गाँव वालों से पूछा कि वो लोग नक्सलियों के बारे में क्या सोचते हैं, क्या नक्लली सच में ही उनकी लड़ाई लड़ने आये हैं या वे आतंकवादी और समाजविरोधी हैं जैसा कि सरकार कहती है?
गाँव वालों के बीच फिर भी सन्नाटा ही छाया रहा.
कुछ युवाओं के चेहरे पर बोलने की इच्छा साफ नज़र आ रही थी पर बुज़ुर्गों की उपस्थिति में एक अजनबी के सामने मुंह खोलना उन्होंने उचित नहीं समझा.
सवाल ये है कि क्या सामाजिक कार्यकर्ता जिला मुख्यालय चन्दौली में दबाव डालकर बोदलपुर के लोगों को काम दिला पाएँगे या बोदलपुर के युवा नदी पार कर नक्सलियों का साथ देने चले जायेंगे?
पता नहीं नक्सलियों के साथ जाने को तत्पर इस गाँव के बारे में सरकार कुछ सोच रही है या नहीं.
और ये भी पता नहीं कि ऐसे कितने ही और गाँव हैं जो बोदलपुर की तरह दोराहे पर खड़े हैं.