पाकिस्तानी सेना के एक प्रमुख अधिकारी ने कहा है कि तालेबान से अफ़गानिस्तान सरकार की स्थिरता को कोई ख़तरा नहीं है.
ज्वाइंट चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ कमेटी के चेयरमैन जनरल एहसान उल हक़ ने कहा कि तालेबान से अस्थायी चुनौती मिल रही है लेकिन अफ़ग़ानिस्तान को उससे रणनीतिक ख़तरा नहीं है.
'एशिया में सुरक्षा' विषय पर सिंगापुर में आयोजित सम्मेलन को संबोधित करते हुए जनरल एहसान उल हक़ ने यह टिप्पणी की.
पाकिस्तानी सेना पर यह आरोप लगता रहता है कि वह तालेबान चरमपंथियों को समर्थन देती रही है.
जनरल हक़ ने अफ़ग़ानिस्तान में हाल के दिनों में हिंसा की घटनाओं में आई तेज़ी की बात मानी.
उन्होंने इसके लिए पुनर्निर्माण की सुस्त गति और वहाँ तैनात विदेशी सैनिकों के प्रति स्थानीय लोगों की नाराज़गी को ज़िम्मेदार ठहराया.
तैनाती
उन्होंने कहा कि हाल ही में उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नैटो) के सदस्य देशों की सेनाओं को दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान में तैनात किया गया है जो तालेबान का गढ़ है.
जनरल हक़ ने नैटो सैनिकों की तैनाती बढ़ाने पर कहा, "जब वे दूर-दराज के इलाक़ों में जा रहे हैं तो स्वाभाविक रुप से वहाँ झड़पें होंगी क्योंकि तालेबान इन इलाक़ों में बेरोकटोक गतिविधियाँ चलाता रहा है. इसके बावज़ूद मेरा मानना है कि इनसे कोई रणनीतिक ख़तरा नहीं है जो अफ़ग़ानिस्तान सरकार और विकास प्रक्रिया को अस्थिर कर सके."
उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के इस आरोप को भी ख़ारिज कर दिया कि पाकिस्तान दोनों देशों की सीमाओं के आरपार तालेबान लड़ाकों के आने-जाने पर रोक नहीं लगा रहा है.
जनरल हक़ ने कहा कि पाकिस्तान ख़ुद इस्लामी चरमपंथ से लड़ रहा है, इसलिए वह अफ़ग़ानिस्तान में इन्हें समर्थन क्यों देगा.
हाल के दिनों में अफ़ग़ानिस्तान के दक्षिणी प्रांतों कंधार और हेलमंद में तालेबान चरमपंथियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़पों की घटनाएँ बढ़ी हैं.