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शुक्रवार, 26 मई, 2006 को 21:07 GMT तक के समाचार

मुकेश शर्मा
बीबीसी हिंदी संवाददाता, सियाचिन से लौट कर

सैनिकों की जीवन रेखा की तरह है वायुसेना

सियाचिन पर तैनात सैनिक चाहे भारत के हों या पाकिस्तान के, दोनों ही ओर के सैनिकों को लगभग उसी तरह की मुश्किलें उठानी पड़ती हैं.

मैंने स्क्वॉड्रन लीडर वत्सल कुमार सिंह से ही पूछा उन चौकियों के बारे में जहाँ दोनों देशों के सैनिक एक दूसरे को देख सकते हैं तो उन्होंने कहा, “इन ऊँचाइयों पर सैनिक जहाँ तैनात हैं उसे ऐक्चुअल ग्राउंड पोज़ीशन लाइन या एजीपीएल कहा जाता है. ये औपचारिक रूप से मान्य रेखा नहीं है इसलिए जहाँ तक हमारा अधिकार है वहाँ तक हम हैं और जहाँ वे हैं वो उनकी जगह है.”

उन्होंने बताया, “कुछ चौकियाँ तो ऐसी हैं, जहाँ दूरी 100 मीटर की भी नहीं है और दूरबीन के ज़रिए उन्हें देखा भी जा सकता है. अभी तो गोलीबारी नहीं हो रही है इसलिए एक तरह का विश्वास बना हुआ है कि वे हम पर गोली नहीं चलाएँगे और हम उन पर गोलीबारी नहीं करेंगे.”

सियाचिन पर सैनिकों का जीवन

सियाचिन विवाद क्या है?

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मगर उससे पहले तो ऐसा होता था कि सैनिक नित्य क्रिया कर्म भी रात में ही निबटा लेना चाहते थे जिससे न वे दिन में बाहर नज़र आएँगे और न ही उन्हें गोलीबारी का सामना करना पड़ेगा.

वैसे संघर्ष के शुरुआती दिनों यानी कि अस्सी के दशक में भी दोनों देशों के वहाँ तैनात सैनिकों की दुआ-सलाम होती रहती थी.

उस समय वहाँ काम कर चुके एक सैनिक ने हमें बताया, “उस समय भी सुबह के समय सिग्नल्स वाले आपस में बात कर लेते थे तो वे एक-दूसरे से पूछते थे कि आप क्या कर रहे हैं या बताते थे कि हम क्या कर रहे हैं.”

जीवन रेखा है 'चीता'

सियाचिन पर बनी सैनिक चौकियों की जीवन रेखा के रूप में काम करती है वहाँ वायु सेना. उन चौकियों पर जो हेलिकॉप्टर उतरता है उसे चीता का नाम दिया गया है.

सेना का कहना है कि उन्हें जिन ऊँचाइयों पर रहना होता है वहाँ सिर्फ़ वही हेलिकॉप्टर काम कर सकता है. सबसे ऊँचाई तक जाने और सबसे ऊँचाई पर बने हेलिपैड पर लैंड करने वाले हेलिकॉप्टर का रिकॉर्ड इसी के नाम है.

संघर्ष विराम से पहले सीमा के नज़दीक़ बनी चौकियों तक हेलिकॉप्टर ले जाने में काफ़ी सावधानी बरतनी होती थी.

चीता हेलिकॉप्टर उन चौकियों पर सिर्फ़ 30 सेकेंड के लिए ही रुकता है. संघर्ष विराम से पहले तो ये इसलिए किया जाता था जिससे विरोधी पक्ष जब तक निशाना साधेगा तब तक हेलिकॉप्टर उड़ जाएगा.

मगर अब भी वही प्रक्रिया अपनाई जाती है जिससे सेना किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहे.

सियाचिन पर तैनात भारतीय सैनिकों के बारे में कहा जाता है कि एक घायल सैनिक के लिए उन पहाड़ों में सबसे सुखद दृश्य होता है, चौकी की ओर बढ़ता चीता हेलिकॉप्टर.

सैनिकों को दूसरी जगहों से लाकर जब सियाचिन पर तैनात किया जाता है तो उससे पहले उन्हें इतने ठंडे मौसम के अनुरूप ख़ुद को ढालने के लिए तैयार किया जाता है.

सैनिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे सिर्फ़ एक सैनिक ही न होकर इन परिस्थितियों में एक पर्वतारोही की तरह काम करें.

सियाचिन से लंबे समय तक जुड़े रहे सेवानिवृत्त लेफ़्टिनेंट जनरल वीआर राघवन इस बारे में कहते हैं, “सैनिक को सीधे सैन्य पर्वतारोही बनाने की प्रक्रिया 90 दिन की होती है और इस बीच में उसे इतना तैयार कर दिया जाता है कि पूरा का पूरा पर्वतारोही बन जाता है.”

(मुकेश शर्मा की सियाचिन डायरी के अगले पन्ने में चर्चा होगी सैनिकों और उनके परिजनों की. इस विषय पर आप अपनी राय हमें hindi.letters@bbc.co.uk पर भेज सकते हैं.)