शुक्रवार, 26 मई, 2006 को 06:06 GMT तक के समाचार
सुशील झा,
बीबीसी संवाददाता, जादूगोड़ा से
भारत की एकमात्र सक्रिय यूरेनियम की खान और रेडियोधर्मी कचरे की समस्याओं पर बीबीसी के लिए कार्यक्रम बनाना मेरे लिए एक अद्भुत अनुभव रहा है.
मैं जादूगोड़ा में ही पैदा हुआ और यूरेनियम कचरे से थोड़ी दूर ही पला बढ़ा हूं इसलिए कह सकता हूं कि समस्या के बारे में मुझे अंदरुनी जानकारी थी.
जब मैंने बीबीसी रेडियो में दो साल पहले काम शुरु किया था तो मज़ाक में हमारे एक साथी ने ये भी कहा अरे आप तो रेडियो पर बहुत सफल होंगे क्योंकि आप तो पहले से ही 'रेडियोएक्टिव' हैं. उनका इशारा मेरे जादूगोड़ा में पलने-बढ़ने से था.
1998 में परमाणु परीक्षणों के बाद जब पत्रकारिता के क्षेत्र में मैंने क़दम रखा तो मैं जानता था कि जादूगोड़ा एक ऐसी कहानी है जिसे कहना बेहद ज़रुरी है.
ढाई साल पहले जब मैं बीबीसी में आया तो मुझे पता था कि यह संस्थान जादूगोड़ा जैसी गंभीर कहानी के लिए मंच दे सकता है.
हालांकि सरकारी रवैया और रेडियोधर्मिता के जटिल पेंच मुझे कुछ डरा ज़रुर रहे थे.
जब मैंने बीबीसी के वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष यह प्रस्ताव रखा था कुछ लोगों को इस पर विश्वास ही नहीं हुआ. मुझसे ये सवाल भी किया गया कि आप कैसे यूरेनियम कचरे के इतने पास रहे.
इस सवाल का कोई जवाब मेरे पास नहीं था क्योंकि अभी भी इस कचरे से सौ दो सौ मीटर की दूरी पर कई लोग रहते हैं.
ख़ैर इन बाधाओं को पार कर जब जादूगोड़ा पहुंचा और वहां का हाल एक पत्रकार के नज़रिए से देखा तो समझ में आया कि लोग यहां वाकई अधूरी ज़िंदगी जी रहे हैं.
मुझे अपने उस दोस्त की भी याद आई जिसके शरीर में गर्दन से नीचे का कोई हिस्सा हिलता नहीं था. वह बातचीत करता था और दुनिया का हर काम करना चाहता था लेकिन लाचार.
दो साल पहले उसकी मौत हो गई.
गुड़िया, दुनिया, आलोवती, मोती और कई बच्चों से मिलने के बाद अपने दोस्त जैसे कई और चेहरे मेरी आंखों के आगे घूम गए.
मेरे पिता भी यूरेनियम की खान में ही काम करके रिटायर हुए हैं और अनौपचारिक तौर पर कंपनी के अधिकारियों ने मुझसे ये भी कहा कि जब आपके परिवार में कोई बीमार नहीं है तो ये कहना कहां तक सही है कि यूरेनियम के कचरे से समस्या हो रही है.
मैं इस मामले में खुद को भाग्यशाली मानता हूं लेकिन पांच हज़ार की आबादी में सौ डेढ़ सौ बच्चों की मानसिक विकलांगता, एक आंख वाले बच्चे, ऐसे बच्चे जिनकी आंखों में आंसू नहीं आते कंपनी के दावों को झुठला रहे थे.
मैंने अपनी कहानी के ज़रिए बस इन्हीं आवाज़ों को दुनिया भर के उन सभी लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की है जो परमाणु शक्ति संपन्न भारत की अनसुनी आवाज़ सुनना चाहते हैं.