गुरुवार, 25 मई, 2006 को 23:10 GMT तक के समाचार
मुकेश शर्मा
बीबीसी हिंदी संवाददाता, सियाचिन से लौट कर
या तो हज़ारों फुट ऊँचे पहाड़ या हज़ारों फुट गहरी खाइयाँ, न पेड़-पौधे, न जानवर, न पक्षी. इतनी बर्फ़ कि अगर दिन में सूरज चमके और उसकी चमक बर्फ़ पर पड़ने के बाद आँखों में जाए तो आँखों की रोशनी जाने का ख़तरा और अगर तेज़ चलती हवाओं के बीच रात में बाहर हों तो चेहरे पर हज़ारों सुइयों की तरह चुभते, हवा में मिलकर उड़ रहे बर्फ़ के अंश.
इन हालात में चौकियों पर तैनात सैनिक कपड़ों की कई तहें पहनते हैं और सबसे ऊपर जो कोट पहनते हैं उसे ‘स्नो कोट’ कहते हैं. इस तरह उन कठिन परिस्थितियों में कपड़ों का भी भार सैनिकों को उठाना पड़ना है.
वहाँ टेंट को गर्म रखने के लिए एक ख़ास तरह की अँगीठी का इस्तेमाल करते हैं जिसे स्थानीय भाषा में 'बुख़ारी' कहते हैं.
इसमें लोहे के एक सिलिंडर में मिट्टी का तेल डालकर उसे जला देते हैं. इससे वो सिलिंडर गर्म होकर बिल्कुल लाल हो जाता है और टेंट गर्म रहता है.
सैनिक लकड़ी की चौकियों पर स्लीपिंग बैग में सोते हैं, मगर ख़तरा सोते समय भी मँडराता रहता है क्योंकि ऑक्सीजन की कमी की वजह से कभी-कभी सैनिकों की सोते समय ही जान चली जाती है.
ख़तरों की लंबी सूची
इस स्थिति से बचाने के लिए वहाँ खड़ा संतरी उन लोगों को बीच-बीच में उठाता रहता है और वे सभी सुबह छह बजे उठ जाते हैं, वैसे उस ऊँचाई पर ठीक से नींद भी नहीं आती.
सियाचिन के बेस कैंप पर हमारी मुलाक़ात हुई स्क्वॉड्रन लीडर वत्सल कुमार सिंह से और जब मैंने उनसे चौकियों पर तैनात सैनिकों की परेशानियों के बारे में पूछा तो एक के बाद एक कर वो परेशानियाँ गिनाते चले गए.
उन्होंने बताया, “उन चौकियों पर जाने वाला सैनिक आम तौर पर इन ऊँचाइयों पर रहने का आदी तो नहीं होता इसलिए उसे मौसम के अनुरूप ख़ुद को ढालने में मुश्किल आती है.”
वत्सल बताते हैं, "वहाँ नहाने के बारे में सोचा नहीं जा सकता और सैनिकों को दाढ़ी बनाने से लिए भी मना किया जाता है क्योंकि वहाँ त्वचा इतनी नाज़ुक़ हो जाती है कि उसके कटने का ख़तरा काफ़ी हो जाता है और अगर एक बार त्वचा कट जाए तो वो घाव भरने में काफ़ी समय लगता है."
वहाँ लगभग तीन महीने सैनिक तैनात रहता है और उस दौरान वो बहुत ही सीमित दायरे में घूम फिर सकता है.
अब चूँकि संघर्ष विराम हो चुका है इसलिए सैनिकों के पास वहाँ काम भी बहुत नहीं रहता और उन्हें बस समय गुज़ारना होता है इसलिए जबकि हर तरफ़ सिर्फ़ बर्फ़ ही बर्फ़ या खाइयाँ ही हों तो ऊब होना भी स्वाभाविक हो जाता है.
चौकियों पर कहीं भी चौबीसों घंटे बत्ती नहीं रहती, कुछ चौकियों पर बिजली जेनरेटर के ज़रिए आती है मगर अधिकतर चौकियाँ रात होते ही अँधेरे में डूब जाती हैं और जीवन ख़त्म हो जाता है.
मनोरंजन का भी वहाँ कोई साधन नहीं है. यानी पहाड़ों के बीच पहाड़ सी मुश्किलों के साथ चल रहा है सैनिकों का जीवन.
(इन मुश्किल हालात की चर्चा जारी रहेगी, मुकेश शर्मा की सियाचिन डायरी के अगले पन्ने में भी)