बीस साल का मोती यूसीआईएल की चहारदीवारी के ठीक बाहर अपनी साईकिल की दुकान चलाता है और अपने मुड़े हुए पैरों को देखकर सोचता है कि आखिर इन्हें हुआ क्या है.
मोती के पैर अंदर से टूटे हैं और अब वो गले हुए लोहे की तरह दिखते हैं. मोती को खुद भी नहीं पता कि ऐसा क्यों हुआ है.
बीमारी के बारे में पूछे जाने पर वो केवल इतना कहते हैं " पता नहीं. डॉक्टर ने कहा कि हड्डी कमज़ोर है. ऐसा होता रहेगा. बचपन में ही टूटना शुरु हुआ. "
ये पूछने पर कि क्या ये पोलियो है वो कहते हैं " नहीं पोलियो नहीं है. "
हालांकि अब मोती के चेहरे पर पैरों को लेकर कोई शिकन नहीं दिखती. वो अपनी ज़िदगीं से और साइकिल की दुकान से खुश है. उसके ग्राहक भी खुश दिखते हैं.
लेकिन मोती के पिता पांचू राम मोती के कष्ट को समझते हैं. बिना पैरों के मोती को पानी भरने में और प्रतिदिन के कार्यों में दिक्कतें होती है.
पांचू राम कहते हैं " मुझे ये तो नहीं पता कि मोती के पैर क्यों टूट रहे हैं लेकिन जादूगोड़ा मे ही ऐसा हुआ. कहीं और नहीं हुआ. यहां पर पचास से अधिक विकलांग बच्चे हैं. कंपनी कोई मदद नहीं करती."
मोती की दुकान के बाहर खड़े लोग कहते हैं कि मोती जैसे और लोग जादूगोड़ा में है और यूसीआईएल को इनकी मदद करनी चाहिए.
हालांकि यूसीआईएल का कहना है कि इस तरह की बीमारियों के लिए उन्हें दोष नही दिया जाना चाहिए.
स्थानीय डॉक्टर बनमाली मंडल कहते हैं " ये तो मैं नहीं कह सकता कि मोती की बीमारी रेडियोधर्मी विकिरणों के कारण है लेकिन कुछ समस्या है तो ज़रुर है. ऐसी विकलांगता मैनें कभी नहीं देखी."
इस पूरी बहस से बेख़बर मोती चुपचाप अपना काम करता है और कभी कभी अपने पैरों को देखकर सोचता है कि उसके पैरों को हुआ क्या है.