शुक्रवार, 19 मई, 2006 को 14:45 GMT तक के समाचार
रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
नेपाल के माओवादी नेता पुष्पकमल दहाल उर्फ़ प्रचंड ने नेपाल नरेश के अधिकारों में कटौती के बारे में संसद में पारित प्रस्ताव को अपर्याप्त बताया है.
बीबीसी हिंदी सेवा से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा, "यह एक महत्वपूर्ण क़दम है, लेकिन क्रांतिकारी क़दम नहीं."
प्रचंड ने कहा कि जनादेश नेपाल में गणतंत्र की स्थापना का है, इसलिए संसद का क़दम जनता की आकांक्षा को पूरा नहीं करता.
उन्होंने आरोप लगाया कि संसद का प्रस्ताव रस्मी राजशाही व्यवस्था कायम रखने का प्रयास है.
प्रचंड ने खेद व्यक्त किया कि प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने संसद के प्रस्ताव के बारे में उन्हें भरोसे में नहीं लिया.
उल्लेखनीय है कि नेपाली संसद ने गुरूवार को राजा ज्ञानेंद्र के अधिकारों को अत्यंत सीमित करने वाले प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित किया था.
प्रस्ताव में सेना पर नेपाल नरेश का नियंत्रण ख़त्म करने की व्यवस्था है. इसमें नेपाल की 90 हज़ार जवानों वाली शाही सेना सीधे संसद के नियंत्रण में लाने का भी प्रस्ताव है.
संसद ने जो प्रस्ताव पारित किया है उसमें राज परिवार को करों के दायरे में लाने और संसद को नरेश का उत्तराधिकारी चुनने का अधिकार देने की भी बात है.
संविधान सभा के गठन की माँग
प्रचंड ने कहा कि सात राजनीतिक दलों के बीच तय 12 सूत्री योजना की भावनाओं के तहत संसद के गठन के तुरंत बाद अंतरिम सरकार की स्थापना के लिए माओवादियों और अन्य नागरिक संगठनों से बातचीत की जानी चाहिए थी.
माओवादी नेता ने सरकार से मौजूदा संसद को भंग करते हुए संविधान सभा के गठन की माँग की ताकि राजशाही का भविष्य तय किया जा सके.
प्रचंड ने संदेह जताया कि सात राजनीतिक दलों का गठजोड़ अमरीका, यूरोपीय संघ और भारत के दबाव में माओवादियों को हाशिये पर डालने की कोशिश कर रहा है.
हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी चाहे तो वह नेपाल की अंतरिम सरकार में शामिल होने का फ़ैसला कर सकती है.
माओवादियों की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में प्रचंड ने कहा कि प्रस्तावित संविधान सभा शाही सेना और माओवादियों की सेना, दोनों के पुनर्गठन के बारे में फ़ैसला कर सकती है.