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मंगलवार, 16 मई, 2006 को 12:28 GMT तक के समाचार

लाभ का पद संबंधी विधेयक पारित हुआ

केंद्र सरकार ने मंगलवार को लाभ का पद संबंधी विधेयक संसद में पेश किया जो दिनभर चली बहस के बाद ध्वनिमत से पारित हो गया.

पारित विधेयक के अनुसार राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष सहित क़रीब 45 पदों को लाभ के पद के दायरे से बाहर रखा गया है.

सदन में इस विधेयक का विरोध करते हुए भारतीय जनता पार्टी सहित कुछ अन्य विपक्षी सदस्यों ने सदन से वॉकआउट किया था.

विपक्ष को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष पद को लाभ का पद न मानने पर आपत्ति थी.

विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने इस विधेयक को पक्षपात पूर्ण बताते हुए आरोप लगाया कि सोनिया गांधी 'सुपर प्रधानमंत्री' की भूमिका में काम कर रही हैं.

उन्होंने कहा कि सभी लोग इस बात से सहमत है कि पिछले कुछ समय में प्रधानमंत्री पद का महत्व कम हुआ है.

आडवाणी ने कहा कि सरकार को चाहिए था कि इस तरह का विधेयक लाने के बजाय वह इस मामले में संविधान संशोधन की बात करती.

भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने भी इस मामले पर सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि सभी सांसदों को समानता की दृष्टि से देखने की ज़रूरत है.

हालांकि बाद में कुछ विपक्षी सदस्यों ने सदन में इस मुद्दे पर बहस में हिस्सा लिया और सरकार का घेराव किया.

कुछ संसद सदस्यों ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि लाभ के पद को फिर से परिभाषित करने की ज़रूरत है.

सत्तापक्ष की दलील

विपक्ष के इन आरोपों का जवाब देते हुए सदन के नेता प्रणव मुखर्जी ने विपक्ष के इन आरोपों को निराधार बताया.

उन्होंने कहा, "हमने इस मामले में सभी दलों को पत्र लिखकर सलाह मांगी थी पर जो लोग आज सदन में इसका विरोध कर रहे हैं, उन्होंने तब इस पर कोई राय नहीं दी थी. बेहतर होगा यदि विपक्ष इस मुद्दे पर बहस की तैयारी के साथ आए. हम किसी भी मामले में बहस के लिए तैयार हैं."

केंद्रीय क़ानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने भी इस मामले में विपक्ष को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि यदि विधेयक पेश नहीं किया जाता तो इससे क़रीब 40 संसद सदस्यों की सदस्यता जा सकती थी जो लाभ के पद मामले के दायरे में आते हैं.

उन्होंने कहा कि कई सदस्यों की सदस्यता जाने पर रिक्त जगहों पर फिर से चुनाव कराने होंगे जिससे देश पर अनावश्यक वित्तीय भार बढ़ेगा.

कई अन्य दलों के नेताओं ने भी इस दलील को विधेयक लाने के लिए अपर्याप्त बताया.

ग़ौरतलब है कि लाभ के पद मामले पर पिछले कुछ समय के राजनीतिक घटनाक्रम के बाद जया बच्चन को अपनी सदस्यता से हाथ धोना पड़ा था वहीं सोनिया गांधी ने इस आरोप के बाद अपनी संसद सदस्यता और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी पर भी इसके दायरे में होने के आरोप लगे थे जिसके बाद इसपर राजनीतिक बहस शुरू हो गई थी.