रविवार, 14 मई, 2006 को 18:36 GMT तक के समाचार
नागेंदर शर्मा
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारतीय सिविल सेवा में पहले स्थान पर रहीं मोना प्रुथी का मानना है कि उनकी सफलता का राज़ है बड़ों का आशीर्वाद, कड़ी मेहनत और सकारात्मक सोच.
आपकी बात बीबीसी के साथ कार्यक्रम में सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने बताया कि इस परीक्षा के लिए अगर उन विषयों को चुना जाए जो स्नातक या स्नातकोत्तर स्तर पर पढ़ाई का हिस्सा रहे हों तो तैयारी में फ़ायदा रहता है.
उनका कहना था कि अगर विषय मिलते जुलते हों तो इससे भी पढाई में आसानी रहती है और वक्त कम लगता है.
मोना प्रुथी का सुझाव था कि सबसे पहले विषयों का चयन करना चाहिए और उनका पाठ्यक्रम अच्छी तरह से देख लेना चाहिए.
प्रुथी मानती हैं कि यह धारणा गलत है कि किसी विशेष भाषा में ही संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा देनी चाहिए.
उनका कहना था कि आयोग द्वारा निर्धारित किसी भी भाषा में लिखित परीक्षा और साक्षात्कार दिए जाने से कोई अंतर नहीं पड़ता.
मोना प्रुथी अभी तक भारतीय राजस्व सेवा के लिए कार्य कर रही थीं.
यह पूछे जाने पर कि वो प्रशासनिक सेवा में क्यों आना चाहती है तो उनका जवाब था कि राजस्व सेवा में कर से जुड़े मामलों पर ही सारा ध्यान केंद्रित रहता है. जबकि प्रशासनिक सेवा का दायरा व्यापक है.
राजनीतिक हस्तक्षेप के सवाल पर उनका कहना था कि राजनीतिज्ञों का काम नीतियाँ बनाना है और नौकरशाहों को उन्हें लागू करने की ज़िम्मेदारी होती है. ऐसे में दोनों को मिलकर काम करना चाहिए.
कार्यक्रम में इस परीक्षा में दूसरे स्थान पर रहीं गुरनीत तेज ने भी हिस्सा लिया.
उनका कहना था कि वैसे तो सिविल सेवा परीक्षा किसी भी भाषा में देने से असर तो नहीं पड़ना चाहिए.
लेकिन वो मानती हैं कि अंग्रेज़ी भाषा में परीक्षा न देने का परीक्षा परिणाम पर असर पड़ सकता है.