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शुक्रवार, 12 मई, 2006 को 13:57 GMT तक के समाचार

राजीव खन्ना
बीबीसी संवाददाता, गुजरात

घड़ी वाली दरगाह है एकता की डोर

गुजरात के वड़ोदरा शहर में अप्रैल 2006 में एक दरगाह को हटाए जाने से उठे विवाद ने सांप्रदायिक रूप ले लिया था और अतिक्रमण के नाम पर हटाई गई रशीदुद्दीन चिश्ती की दरगाह के मसले से हिंदु-मुस्लिम दंगा भड़क गया था.

तीन दिन तक हुई हिंसा में छह लोगों की मौत हो गई थी.

देश भर में पीर-फकीरों की दरगाहें भारत की धर्मनिर्पेक्ष संस्कृति का प्रतीक हैं क्योंकि यहाँ पर सब धर्म और जातियों के लोग आते हैं.

मौजूदा दौर में इन दरगाहों को उदारवादी इस्लाम के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है. क़रीब 200 साल से अधिक पुरानी रशीदुद्दीन चिश्ती की दरगाह भी कुछ इसी तरह की थी.

उसी वड़ोदरा ज़िले में शहर से क़रीब 20 किलोमीटर दूर अमहदाबाद जाने वाली सड़क पर बाबा बाला पीर की दरगाह है जहाँ सभी धर्मों के लोग आते हैं और मन्नतें माँगते हैं.

इस दरगाह की एक विशेषता तो ये है कि यहाँ की देखभाल करने वाला व्यक्ति एक हिंदू है जिसका नाम हरिभाई पटेल है.

सिर्फ़ उनका नाम जानने के बाद ही उनके धर्म के बारे में पता चलता है कि वह हिंदू हैं.

घड़ियाँ ही घड़ियाँ

पर इससे भी बड़ी विशेषता यहाँ की ये है कि इस दरगाह पर चढ़ावा पैसे के रूप में नहीं होता बल्कि लोग घड़ियाँ चढ़ाते हैं.

यहाँ क़दम रखते ही आप को तमाम तरह की घड़ियाँ नज़र आती हैं - कुछ दीवार घड़ी हैं तो कुछ डिजिटल घड़ियाँ हैं. इनमें से कुछ पर तो हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरें भी बनी रहती हैं.

शायद इसी वजह से इस जगह का नाम घड़ियाली बाबा की दरगाह पड़ गया है.

घड़ियाँ चढ़ाने के अलावा लोग एक और बहुत रोचक तरीके से दरगाह को इज़्ज़त देते हैं. यहाँ जब भी कोई घड़ी चढ़ाने के लिए आता है तो दरगाह के पास आकर हॉर्न ज़रूर बजाता है.

यहाँ अक्सर आने वाले सुनील भाई का कहना है, "हॉर्न बजाकर हम बाबा को सलामी देते हैं."

मज़े की बात ये है कि किसी को भी इस बात का पता नहीं कि यहाँ घड़ियाँ चढ़ाने का प्रचलन कब और क्यों शुरू हुआ था.

हरिभाई पटेल का मानना है, "शायद लोग इस बात को ध्यान में रखते हैं कि समय सबसे बलवान है."

पेशे से ट्रक ड्राइवर मोहम्मद हनीफ़ कहते हैं, "मैं यहाँ लगभग 20 साल से आ रहा हूँ. कुछ समय यहाँ बिताने से मुझे रूहानी शांति मिलती है."

देर रात वड़ोदरा से लौटते समय जब मैं यहाँ कुछ समय के लिए रुका तो मेरी मुलाक़ात एक बुज़ुर्ग दम्पति से हुई. कोइलबेन और जीत पटेल एक घड़ी चढ़ाने के लिए यहाँ आए थे.

कोइलबेन का कहना था, "हमने एक मन्नत माँगी थी कि अगर हमारी गर्भवती बेटी का बच्चा बिना ऑपरेशन के यानी प्राकृतिक तरीके से होगा तो हम यहाँ एक घड़ी चढ़ाएंगे. मेरी बेटी ने जुड़वाँ बच्चों को सामान्य तरीके से ही जन्म दिया है और हम यहाँ शिव की फोटो वाली घड़ी चढ़ाने आए हैं."

धर्म के नाम पर विघटित हुए गुजरात के समाज में ये दरगाहें और इनसे जुड़ी मान्यताएँ आज भी कुछ हद तक हिंदू और मुसलमानों को एकता की डोर में बाँधे हुए हैं.