बुधवार, 10 मई, 2006 को 18:57 GMT तक के समाचार
पाँच राज्यों के चुनाव के पहले आरक्षण पर दिए गए केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह के बयान को चुनाव आयोग ने अनुचित तो माना है लेकिन उन्हें आचार संहिता के उल्लंघन के आरोपों से बरी कर दिया है.
आयोग का कहना है कि उनके पास अर्जुन सिंह के ख़िलाफ़ परिस्थितिजन्य साक्ष्य तो हैं लेकिन पुख़्ता सबूत नहीं हैं.
चुनाव आयोग की तीन सदस्यीय समिति ने अर्जुन सिंह के बयान पर जवाब तलब किया था.
मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह ने अपनी ओर से लिखित जवाब दिए थे और ख़ुद भी चुनाव आयोग के समक्ष उपस्थित हुए थे.
इसके अलावा केंद्र सरकार की ओर से कैबिनेट सचिव ने भी लिखित जवाब आयोग के पास भेजे थे.
इस सब पर विचार करने के बाद चुनाव आयोग ने बुधवार को देर शाम इस मामले पर अपना फ़ैसला दिया है.
उल्लेखनीय है कि पाँच अप्रैल को अर्जुन सिंह ने मीडिया को दिए अपने बयान में कहा था कि केंद्र सरकार आईआईटी और आईआईएम जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण लागू करने जा रही है.
ये बयान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पाँच अप्रैल को प्रसारित हुआ था और प्रिंट मीडिया ने इसे छह अप्रैल को प्रकाशित किया था.
हालांकि मीडिया ने 27 प्रतिशत आरक्षण की ख़बरें दी थीं लेकिन अर्जुन सिंह ने अपनी सफ़ाई देते हुए कहा कि सरकार ने ये फ़ैसला नहीं किया है कि आरक्षण कितना दिया जाना चाहिए.
फ़ैसला
चूंकि तब पाँच राज्यों में चुनाव के लिए अधिसूचना जारी हो चुकी थी, इस घोषणा को चुनाव आयोग ने इसे प्रथम दृष्टया आदर्श चुनाव संहिता का उल्लंघन माना और अर्जुन सिंह और केंद्र सरकार से जवाब तलब किए.
अर्जुन सिंह ने 9, 15 और 18 अप्रैल को अपने जवाब चुनाव आयोग के पास भेजे जबकि केंद्र सरकार की ओर से कैबिनेट सचिव ने 10, 18, 20 और 28 अप्रैल को अपने जवाब भेजे.
चार मई को अपनी मर्ज़ी से अर्जुन सिंह चुनाव आयोग के समक्ष ख़ुद उपस्थित हुए. हालांकि चुनाव आयोग का कहना है कि उन्होंने बातें वही कहीं जो वे अपने पत्रों में कह चुके थे.
आयोग का कहना है, "मीडिया रिपोर्टों और जवाबों की जाँच के बाद लगता है कि अर्जुन सिंह के ख़िलाफ़ परिस्थितिजन्य साक्ष्य तो हैं लेकिन उनके ख़िलाफ़ आचार संहिता के उल्लंघन के पुख़्ता सबूत नहीं हैं."
चुनाव आयोग ने माना है कि सत्ता में बैठे लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे ज़्यादा ज़िम्मेदारी के साथ आचार संहिता का पालन करेंगे, लेकिन मौजूदा मामले में लगता है कि ऐसा नहीं किया गया.
चुनाव शुरु होने के साथ ही शुरु हुआ विवाद चुनाव आयोग के इस फ़ैसले के बाद ठीक ऐसे दिन ख़त्म हुआ है जब चुनाव परिणाम आने को एक दिन शेष था.