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रविवार, 30 अप्रैल, 2006 को 21:50 GMT तक के समाचार

पीएम तिवारी, कोलकाता से

बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं मनमोहन सिंह

पहली नज़र में तो वे भी उन हजारों टैक्सी चालकों में से एक लगते हैं जो दिन-रात पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता की सड़कों के चक्कर काटते रहते हैं.

लेकिन बातचीत में वो धीरे-धीरे खुलते हैं और तब उनकी प्रतिभा के कई नए पहलू सामने आते हैं जो चौंकने पर मज़बूर कर देते हैं.

वो हिंदी-अंग्रेजी की तमाम पत्रिकाएं व अख़बार पढ़ते हैं और फ़िल्मों में भी अभिनय कर चुके हैं.

टैक्सी नंबर डब्ल्यूबी-04 ए-5594 के इस चालक का नाम सुनकर ही आप चौंक जाएंगे. जी हां, पंजाब के मोगा जिले के भिंडरकलां गांव में जन्मे इस शख्स का नाम है मनमोहन सिंह.

बीते 40 वर्षों से कोलकाता की सड़कों पर टैक्सी चलाने वाले मनमोहन सिंह देखने में भले मामूली ड्राइवर लगते हों, उनका जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहा है.

उन्होंने कई फ़िल्मों में भी काम किया है. लेकिन जल्दी ही फ़िल्मी दुनिया को अलविदा कह वे अपने पुराने पेशे में लौट आए.

आपने फिल्मी दुनिया को छोड़ कर टैक्सी चलाने का काम ही क्यों चुना? इस पर वो कहते हैं कि ‘फ़िल्मी दुनिया बहुत बुरी है. वहां भले लोगों के लिए कोई जगह नहीं है. वहां मेहनत व ईमानदारी की कोई कद्र नहीं है.’

सिंह अपनी बातों के समर्थन में नवीन निश्चल की मिसाल देते हैं. उनके दिमाग पर फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध हावी थी. इसलिए कुछ दिनों बाद फ़िल्मों में करने के मकसद से वे कोलकाता से मुंबई पहुंच गए.

वहां तपन सिन्हा ने उनको अपनी फिल्म सगीना महतो में एक रोल दिया. लेकिन बाद में दुर्भाग्य से उनकी भूमिका ही खत्म कर दी गई.

बाद में छह फीट लंबे सिंह को अर्चना, छिन्नपात्रो व रौद्रछाया जैसी बांग्ला फिल्मों में काम करने का मौक़ा मिला.

फ़िल्मों में अभिनय

शक्ति सामंत, दिलीप कुमार, गुलजार, हेमंत कुमार, किशोर कुमार, कुमार शानू व बीआर चोपड़ा सरीखे फ़िल्मकारों से अपनी नजदीकी को याद करते हुए मनमोहन कहते हैं कि ‘वे दिन ही कुछ और थे. लेकिन फिल्मी दुनिया में बाहर से जितनी चमक-दमक नजर आती है भीतर उतना ही अंधेरा है. इसलिए मैंने जल्दी ही इसे अलविदा कह दिया.’

वे गाने के भी शौकीन है और इसके लिए बचपन में आकाशवाणी की ओर से उनको 50 रुपए का नकद इनाम भी मिला था.

साठ से ऊपर के हो चले सिंह चुस्ती-फुर्ती में नौजवानों को भी मात देते हैं. अपने साहस व ईमानदारी के चलते वे लोगों में काफी लोकप्रिय हैं.

देश के सबसे व्यस्ततम स्टेशनों में से एक हावड़ा के बाहर निकलते ही किसी से पूछने पर उनके बारे में पता लग सकता है. कोलकाता की सड़कों पर 40-45 साल का उनका सफ़र ऐसी कितनी ही अनगिनत घटनाओं से भरा है.

वो बीमारों व गरीबों की अक्सर मदद करते रहते हैं. सिंह बताते हैं कि ‘रब की कृपा से रोजाना सौ-डेढ़ सौ रुपए जरूरतमंदों में बांट देता हूं. कभी किसी बीमार को अस्पताल पहुंचाने का किराया नहीं लिया.’

उनकी टैक्सी में एक बार बैठने वाले विदेशी पर्यटक भी उनसे इतना प्रभावित होते हैं कि अपने देश जाकर अक्सर उनको पत्र लिखते रहते हैं. मनमोहन के पास ऐसे पत्रों का ढेर है.

आपको अपने नाम से कोई परेशानी नहीं होती जबकि प्रधानमंत्री का नाम भी यही है? इस सवाल पर वो हंसते हुए कहते हैं कि ‘अच्छा लगता है. कई बार मित्र व परिचित नाम को लेकर उनको चिढ़ाते भी हैं. लेकिन यह तो महज एक संयोग है.’

वे पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि 1953 में अपने माता-पिता के साथ मैं पहली बार इस शहर में आया था. स्कूल की पढ़ाई पूरी होते ही पिता के गुजर जाने के कारण पूरे परिवार का बोझ मेरे कंधों पर आ गया.

तब रोजी-रोटी के लिए मैं फुटपाथ पर चाय बेचने लगा. कुछ दिनों बाद लाइसेंस मिल गया तो टैक्सी चलाने लगा और इसी से परिवार की गाड़ी चलने लगी.’

विक्टोरिया मेमोरियल के पास हरीश मुखर्जी रोड पर स्थित संत कुटिया गुरुद्वारा उनका अस्थायी ठिकाना है.

वो कहते हैं कि ‘अब ज्यादातर वक्त टैक्सी में ही गुजरता है.’ सुबह-सुबह वो हर अख़बार पर नजर जरूर दौड़ाते हैं.

मनमोहन कहते हैं कि ‘टैक्सी में बैठने वाले यात्रियों की बातचीत से उनको जीवन में बहुत कुछ करने की प्रेरणा मिली है. उनसे काफी कुछ सीखा भी है. कॉलेज तो नहीं जा सका. लेकिन टैक्सी ही मेरे लिए कॉलेज है.’

बातचीत के दौरान ही मनमोहन सिंह की टैक्सी का नंबर आ जाता है और वे किसी नए यात्री को बिठा कर फिर मिलने की बात कह कर किसी नई मंज़िल की ओर निकल पड़ते हैं.