भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने चेतावनी दी है कि यदि सरदार सरोवर बांध से विस्थापित होने वाले लोगों के राहत और पुनर्वास के पर्याप्त कदम नहीं उठाए जाते तो आगे होने वाला निर्माण के काम पर रोक लगा दी जाएगी.
सरदार सरोवर मामले पर सर्वोच्च न्यायालय में चली सुनवाई के दौरान न्यायालय ने मध्यप्रदेश सरकार से पिछले न्यायिक आदेशों के अनुसार विस्थापितों के पुनर्वास के लिए पर्याप्त कदम उठाने को कहा. इस मामले में अगली सुनवाई एक मई को होगी.
विस्थापित लोगों के लिए काम कर रही संस्था नर्मदा बचाओ आंदोलन ने याचिका दायर कर मांग की थी कि बांध की ऊंचाई 110 मीटर से बढ़ाकर 122 मीटर न की जाए.
जहाँ नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता इस मुद्दे पर भूख हड़ताल कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने कुछ समर्थकों के साथ कुछ घंटे के लिए भूख हड़ताल पर बैठे.
न्यायालय ने ये भी कहा कि केंद्र सरकार दोनों पक्षों के बीच समझौता करवाने के लिए यदि कोई कदम उठाना चाहिए तो उसे इसकी स्वतंत्रता है.
इस परियोजना से जहाँ गुजरात के कच्छ और सौराष्ट्र क्षेत्रों को पानी मिलना है वहीं महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्यप्रदेश राज्यों को भी इस परियोजना से फ़ायदा होगा.
इससे पहले न्यायालय ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा था कि नर्मदा नदी पर बन रहे बाँध का काम जारी रखना चाहिए और साथ ही पुनर्वास का काम प्रभावी तरीक़े से होता रहना चाहिए.
न्यायालय ने यह भी कहा था कि इस मामले पर राजनीति नहीं होनी चाहिए.
सरकार निर्माण के पक्ष में
मामले पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए बांध का कार्य जारी रखने और पुनर्वास के लिए समिति का गठन करने की प्रतिबद्धता जताई.
कोर्ट ने सरकारी पक्ष सुनने के बाद कहा कि इस मामले में संतुलन बनाना ज़रुरी है क्योंकि विस्थापितों की संख्या बहुत अधिक है.
मुख्य न्यायाधीश वाई के सब्बरवाल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, "ज़रुरत इस बात की है कि इस मुद्दे को भावनात्मक रुप से न देखा जाए बल्कि सौहार्द्रपूर्ण माहौल में बातचीत से रास्ता निकाला जाए."
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत के 2000 में दिए गए फ़ैसले के अनुरुप ही पुनर्वास किया जाए.
पीठ का कहना था कि विस्थापन और पुनर्वास जटिल मुद्दा है जिस पर सभी को खुश नहीं किया जा सकता लेकिन पुनर्वास ठीक से होना चाहिए.
अतिरिक्त सालीसिटर जनरल गोपाल सुब्रहमण्यम का कहना था कि ज़रुरत इस पूरे मसले का समाधान खोजने की है न कि समस्या को और जटिल करने की.
दूसरी तरफ नर्मदा बचाओ आंदोलन का पक्ष रखने वाले एडवोकेट शांति भूषण ने कहा कि पुनर्वास का काम इलाक़ों के डूबने से 12 महीने पहले हो जाना चाहिए था.