रविवार, 16 अप्रैल, 2006 को 17:19 GMT तक के समाचार
नागेंदर शर्मा
बीबीसी संवाददाता
भारत सरकार के कैबिनेट सचिव रह चुके टीएसआर सुब्रमण्यन मानते हैं कि भारत में आपदाओं से निपटने के लिए जो तैयारी होनी चाहिए वह नहीं होती.
उनका कहना है कि किसी भी घटना के बाद जो राहत कार्य होने चाहिए वो भी प्रभावी ढंग से नहीं हो पाते.
उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन की जो वर्तमान व्यवस्था देश में है, उसमें काफ़ी सुधारों की गुंजाइश है पर केवल प्रशासन पर ही आश्रित रहना समझदारी नहीं है.
सुब्रमण्यन बीबीसी हिंदी रेडियो के कार्यक्रम आपकी बात, बीबीसी के साथ में श्रोताओं के सवालों का जवाब दे रहे थे.
कार्यक्रम में शामिल दिल्ली के पूर्व अग्निशमन प्रमुख टीएस ढेरी ने भी पिछले दिनों मेरठ में हुई आगजनी जैसी घटना और ऐसी ही कई दूसरी घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी घटनाओँ पर तभी तक चर्चा होती है, जबतक कि अगली घटना नहीं हो जाती.
उन्होंने कहा, "हम किसी भी घटना से जो सबक सीखते हैं उन्हें याद नहीं रखते और न ही प्रयोग में लाते हैं. नतीजतन जो भी याद आता है वह तब याद आता है, जब दूसरी घटना घट जाती है."
ढेरी ने ऐसी घटनाओं में होने वाली क्षति के लिए लोगों में जागरूकता की कमी को भी एक बड़ा कारण बताया.
सावधानी हटी, दुर्घटना घटी
ढेरी ने कहा, "देश की 70 प्रतिशत आबादी गांवों में है जहाँ न तो जागरूकता है और न ही साधन उपलब्ध हो पाते हैं. इससे भी ज़्यादा चिंताजनक है शहरों में कार्यक्रमों के आयोजन और भवनों के निर्माण में की जाने वाली अनदेखी."
उन्होंने राजधानी दिल्ली का ही हवाला देते हुए कहा कि बड़ी इमारतों के निर्माण के दौरान और बाद में भी इनमें प्राकृतिक आपदाओं और मानव जनित आपदाओं से निपटने के कई ज़रूरी इंतज़ाम नहीं किए जाते.
सुब्रमण्यन ने मेरठ की घटना का ज़िक्र करते हुए कहा, "इस मामले पर अगर एक महीने में ही जाँच पूरी कर ली जाती है और उसके एक महीने बाद तक दोषियों के ख़िलाफ़ कड़े क़दम उठा लिए जाते हैं तो इससे काफ़ी असर पड़ेगा क्योंकि लोग घटना और उससे जुड़े पहलुओं को लंबे समय तक याद नहीं रखते."
उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में चाहे वह निजी कंपनियां हो या फिर कोई सरकारी आयोजन, जबतक नीति-निर्देशों और नियमों का पालन न करने वालों के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ नहीं अपनाया जाएगा, ऐसी घटनाओं की तादाद में कमी आना मुश्किल ही है.