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शुक्रवार, 14 अप्रैल, 2006 को 17:43 GMT तक के समाचार

पाणिनी आनंद
दिल्ली से

'धमाके करने वालों का कोई धर्म नहीं'

'हम मुसलमान हैं, इसलिए बदनाम हो जाते हैं. बनारस हो या जामा मस्जिद, दोनों ही जगहों पर जिन लोगों ने धमाके किए हैं, उनका कोई धर्म नहीं है. अगर वो मुसलमान होते तो इस तरह न करते...कौन ऐसा है जो अमन नहीं चाहता पर किसी कौम को बदनाम करना कहाँ तक सही है...'

यह ग़ुस्सा और दर्द का मिला-जुला भाव था उन लोगों की ज़बान पर जो जुमे की नमाज़ अदा करने के लिए दिल्ली की जामा मस्जिद में शाम के वक्त मौजूद थे.

जामा मस्जिद में विस्फ़ोट की तस्वीरें

शुक्रवार की इस शाम को क़रीब साढ़े पाँच बजे और फिर कोई 15 मिनट के अंतर पर एक के बाद एक धमाकों में क़रीब आठ लोग घायल हो गए.

दिल्ली की इस लगभग 350 वर्ष पुरानी मस्जिद में हुए इन धमाकों में हालांकि किसी की मौत नहीं हुई पर वज़ू की जगह के पास बिखरा ख़ून और विस्फोट से काला पड़ गया फ़र्श पर लगा संगमरमर दहशत पैदा कर देने के लिए काफ़ी था.

एक व्यक्ति ने ग़ुस्से में जो कुछ कहा उससे उनकी आँखों में आंसू भर आए थे, "जो मुसलमानों को ग़लत कहते हैं, उनसे पूछिए कि आतंक कौन फैला रहा है. हमारा नाम लेते हैं. अब क्या कहेंगे, किसका नाम लेंगे इसके लिए."

आलम यह था कि एक तरफ प्रशासन हाय-हाय के नारे लग रहे थे तो दूसरी ओर लोगों में घटना के कारणों से लेकर मस्जिद की सुरक्षा तक कई सवाल उठ रहे थे.

मौके पर पहुँचकर पुलिस प्रमुख, केके पॉल और मस्जिद के शाही इमाम, अहमद बुख़ारी ने लाउड स्पीकर से लोगों से अमन बनाए रखने की अपील की.

धमाकों के एक चश्मदीद ने बताया, "हम नमाज़ के बाद दुआ कर रहे थे और कई लोग जा चुके थे नहीं तो भगदड़ मचती और बड़ी तादाद में लोग मारे जाते."

सुरक्षा और अमन

लेकिन विस्फोटक लेकर कोई भीतर गया कैसे, इस सवाल पर लोगों ने बताया, "जुमे को नमाज़ के लिए काफ़ी बड़ी तादाद में लोग आते हैं. ऐसे में एकदम से भीड़ आती है जिसकी तलाशी नहीं हो पाती. इसका फ़ायदा इन धमाकों के लिए उठाया गया है."

मैंने शाही इमाम से पूछा कि वह किसको ज़िम्मेदार मानते हैं. उन्होंने बताया, "यह उन्हीं लोगों का काम है, जिन्होंने बनारस के संकटमोचन मंदिर में धमाका किया. यह उसी की कड़ी है. लोगों ने बनारस के धमाकों के लिए मुसलमानों को दोष दिया जो कि ग़लत था. यह हरक़त वही कर सकते हैं जो अमन के ख़िलाफ़ हैं."

कुछ देर बाद दूसरी नमाज़ का वक्त हो गया. इस बीच बम निरोधक दस्ते परिसर के कूड़ेदानों, नालियों और बाक़ी जगहों की छानबीन में लगे थे.

बहरहाल, नमाज़ अदा हुई और फिर से शांति और अमन बनाए रखने का संदेश सुनाया गया पर इसके साथ-साथ नारे हवा में उछाले जाते रहे.

परिसर और उसके आसपास का इलाके में बड़ी तादाद में लोग देर रात तक इकट्ठा थे. छोटे-छोटे दुकड़ों में लोगों के बीच बहस जारी है. सबके सामने एक ही सवाल है और वह है, "ये हरक़त किसकी हो सकती है?"