गुरुवार, 13 अप्रैल, 2006 को 19:52 GMT तक के समाचार
राजा ज्ञानेंद्र ने राजनीतिक दलों से कहा है कि वे बातचीत में शामिल हों जिससे कि नेपाल में पूरे लोकतांत्रिक ढंग से चुनाव करवाए जा सकें.
नेपाली नए वर्ष पर राष्ट्र के नाम अपने बहुप्रतीक्षित संबोधन में राजा ने ये अपील की है.
राजा की इस तरह की अपील पहले भी करते रहे हैं और नेपाल के राजनीतिक दल इससे पहले ठुकरा चुके हैं.
नेपाली कांग्रेस (डेमोक्रेटिक) के वरिष्ठ नेता मृणेंद्र रिजाल राजा ज्ञानेंद्र की अपील से सहमत नहीं हैं.
उनका कहना है कि राजा अपने एजेंडे पर अड़े हुए हैं और वो बातचीत को नहीं बुला रहे हैं.
उनका कहना है कि माओवादी भी कह चुके हैं कि संविधान सभा के चुनाव होते हैं तो वे शांति प्रक्रिया में शामिल होंगे.
नेपाल में बीबीसी संवाददाता का कहना है कि राजा ज्ञानेंद्र ने कोई नई पहल नहीं की है और वे अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे हैं.
नेपाल में पिछले एक हफ़्ते से विपक्षी दल और माओवादी राजशाही का विरोध करते हुए लोकतंत्र की स्थापना के लिए हड़ताल कर रहे हैं.
सात प्रमुख विपक्षी दलों की इस हड़ताल को माओवादी विद्रोहियों का भी समर्थन है.
विपक्षी दलों की हड़ताल का असर इतना व्यापक है कि इसे रोकने के लिए सरकार ने राजधानी काठमांडू और आसपास के शहरों में कर्फ़्यू लागू कर रखा है और मोबाइल नेटवर्क बंद कर दिए हैं.
लेकिन कर्फ़्यू के बावजूद हज़ारों लोग हर दिन सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रहे हैं.
सुरक्षाबलों और राजा के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों के बीच झड़पें हो रही हैं और अब कई लोगों की मौत हो चुकी है.
अपील
उल्लेखनीय है कि फ़रवरी, 2005 में राजा ज्ञानेंद्र ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार को बर्ख़ास्त कर सत्ता अपने हाथ में ले ली थी.
शुक्रवार को शुरु होने वाले नेपाली नए वर्ष की पूर्व संध्या पर राजा ज्ञानेंद्र ने सरकारी टेलीविज़न पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में राजनीतिक दलों से अपील की है.
उन्होंने अपने संबोधन में कहा, "शांति और लोकतंत्र पर भरोसा करने वाले सभी राजनीतिक दलों को एक बहुदलीय लोकतंत्र की स्थापना के लिए आम चुनाव में हिस्सा लेना चाहिए."
अपने छोटे संबोधन में राजा ज्ञानेंद्र ने देश भर में चल रहे आंदोलन का कोई ज़िक्र नहीं किया जिसमें माओवादी राजनीतिक दलों का साथ दे रहे हैं.
बीबीसी संवाददाता के अनुसार सत्ता पर काबिज होने के बाद से राजा बार बार दोहराते रहे हैं कि जितनी जल्दी हो सके चुनाव करवाए जाएँगे और वे राजनीतिक दलों से बातचीत की अपील भी करते रहे हैं.
लेकिन नेपाल के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजा ज्ञानेंद्र के आलोचकों का कहना है कि जैसे विद्रोह के हालात नेपाल में हैं वहाँ चुनाव करवाना संभव ही नहीं है.
वैसे 'लोकतंत्र की स्थापना' के क़दम के रुप में राजा ज्ञानेंद्र ने पिछली फ़रवरी में स्थानीय निकायों के चुनाव करवाए थे, लेकिन उसमें मुख्य धारा के राजनीतिक दलों ने हिस्सा नहीं लिया था.
उन चुनावों में उम्मीदवारों की कमी थी और लोग वोट देने बाहर ही नहीं निकले. उन चुनावों की अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने आलोचना की थी.
चेतावनी
उधर बीबीसी से हुई बातचीत में संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार आयुक्त लुईस आरबर ने कहा है कि नेपाल के राजा को माओवादी विद्रोहियों से युद्ध विराम की पहल करते हुए बातचीत करनी चाहिए.
उन्होंने चेतावनी दी है कि ऐसी ही स्थिति रही तो मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी जा सकता है.
वैसे दो दिन पहले ही अमरीका ने राजा ज्ञानेंद्र की कड़ी आलोचना करते हुए देश में लोकतंत्र बहाल करने की मांग की थी.
अमरीका का कहना था कि पिछले 15 महीनों में राजा का प्रत्यक्ष शासन हर क्षेत्र में नाकाम रहा है.
इसके बाद भारत की ओर से भी नेपाल को स्पष्ट संकेत दे दिए गए थे कि अब वहाँ राजशाही के दिन लद गए दिखते हैं.