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बुधवार, 12 अप्रैल, 2006 को 15:03 GMT तक के समाचार

सीमा चिश्ती
संपादक, बीबीसी हिंदी, दिल्ली

किसके ज़िम्मे है सामाजिक न्याय का प्रश्न

बुधवार को चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार और अर्जुन सिंह से इस मसले पर 18 अप्रैल तक स्पष्टीकरण देने के लिए कहा है पर इससे पहले आरक्षण के मसले पर भारत के मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने पिछले दिनों जो घोषणा की उससे एकबार फिर आरक्षण के संरक्षण और विरोध की बहस शुरू हो गई है.

पिछड़े वर्गों की समस्या पर ध्यान देने के लिए बैठाए गए बीपी मंडल की अध्यक्षता वाले दूसरे आयोग के गठन के 12 वर्ष बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने उसकी रिपोर्ट पर आंशिक अमल किया था यानी सरकारी नौकरियों में साढ़े 27 प्रतिशत आरक्षण.

उत्तर भारत में आरक्षण के विरोध में उठे बवाल से सभी परिचित हैं. उसने भारत में राजनीति के स्वरूप को बदल दिया. राजनीतिज्ञों की एक बिल्कुल अलग जमात तैयार हो गई.

इस बार प्रशिक्षण संस्थान में पिछड़े वर्गों के आरक्षण पर चर्चा हो रही है.

आरक्षण का विरोध

बीटेक के अंतिम वर्ष में पढ़ाई कर रहे अंकित मिश्रा कहते हैं, "जो बच्चा दिन रात मेहनत करके लगा हुआ है, उसे आरक्षण की व्यवस्था के कारण अवसर नहीं मिलता है. क्या यह एक नकारात्मक पहलू नहीं है."

उन्होंने कहा, "अगर हम भारत को आगे लाना चाहते हैं तो निश्चित रूप से मदद करना चाहिए लेकिन सिर्फ़ और सिर्फ़ आर्थिक आधार पर. हमें प्रतिभाओं के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहिए."

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत कहते हैं कि यह सब वोटों की राजनीति की वजह से किया जा रहा है पर इससे भी ज़्यादा ज़ोर देकर वह कहते हैं कि जिन पिछड़ी जातियों ने अब तक शिक्षा को नकारा, उन्हें अब विशेषाधिकार क्यों दिए जाएँ.

पंत कहते हैं, "आप हरियाणा और पंजाब का इलाक़ा देख लें, वह सिख हो या जाट, चौड़े से यह कहता है कि पढ़े ब्राह्मण का लड़का, मेरे लड़के को पढ़ने की क्या ज़रूरत है. 10 भैंसें बंधी है, 50 लीटर दूध बिकता है, इतने बीघे की खेती है और खाता-पीता संपन्न परिवार है."

उन्होंने कहा, "आज जो सारा आकर्षण आरक्षण के लिए दिख रहा है, वह इस कारण नहीं है कि लोगों के मन में शिक्षा के लिए एकाएक कोई प्रेम उपजा है. कारण यह है कि शिक्षा का आरक्षण गारंटी है सरकारी नौकरी के आरक्षण की."

दरअसल, पिछड़े वर्गों को परिभाषित करने का सिलसिला वर्ष 1921 में माइसोस्ट्रेट में शुरू हुआ था और दक्षिण भारत में ब्राह्मण समाज के बहुत छोटे होने के कारण आरक्षण इतना मुश्किल साबित नहीं हुआ था जितना कि उत्तर भारत में जहाँ सवर्ण जातियों की अच्छी ख़ासी तादाद है.

भारत में वर्ष 1931 के बाद से जनगणना जातीय आधार पर नहीं हुई है.

मंडल आयोग ने जिन तीन हज़ार अन्य पिछड़ी जातियों का ज़िक्र किया था, वह उनकी राय में जाति नहीं, वर्ग थे. सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक पहलुओं के मद्देनज़र इनकी सूची बनाई गई थी.

क्यों मिले आरक्षण

'लोक आस्था' के प्रताप चौधरी की तरह मंडल के हक़ में कई लोगों का मानना है कि अगर पिछड़े वर्गों को इस प्रकार हक़ नहीं दिए जाते तो वे हमेशा ऊँची जातियों से पीछे रहेंगे.

प्रताप कहते हैं, "जो लोग आरक्षण में जाते हैं, आख़िर परीक्षा तो एक ही पास करते हैं. उनको कोई रियायत तो नहीं मिलती. डॉक्टर है तो उसको एमबीबीएस पास करना पड़ेगा या आईआईटी में है तो भी सभी परीक्षाओं को पास तो करना ही पड़ेगा."

राजन जाति से धोबी हैं और कहते हैं कि इन्हें अपने बच्चे नाती-नतिन से कपड़े धुलवाने का कोई शौक नहीं है.

राजन कहते हैं, "भेदभाव तो है ही. अगर भेदभाव न हो तो हमें कोई दिक्कत ही न हो. पोती तो हमारी अभी बहुत छोटी है. हम तो कहते हैं कि बच्चे अच्छी ज़िंदगी पकड़ेंगे तो ऊँचा नाम होगा. अगर शिक्षा अच्छी मिलेगी तो बच्चे ऊँचे जाएंगे नहीं तो फिर हमारी तो वही स्थिति है कि कपड़े धोएंगे और मेहनत करके खाएँगे."

पिछले वर्ष अगस्त में जब सुप्रीम कोर्ट ने निजी और सरकारी सहायता न प्राप्त करने वाले संस्थानों से कोटा हटवा देने की सिफ़ारिश की थी तो उसके बाद ही सभी राजनीतिक पार्टियों ने मिलकर नया विधेयक पारित किया था और इस वर्ष जनवरी में संविधान में 104वाँ संशोधन क़ानून बन गया.

उस क़ानून का नतीजा था, निजी शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण और अर्जुन सिंह के अनुसार, उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण का औचित्य निकलता है लेकिन यदि किसी समुदाय या वर्ग का उत्थान सही मायने में करना है तो वह सिर्फ़ कुछ सीटों में आरक्षण से नहीं बल्कि कई और ज़रियों से हो सकता है.

मसलन, सीटों की संख्या बढ़ाना और सरकारी शिक्षण संस्थानों के स्तर को बढ़ाना.

सरकार और निजी क्षेत्र की साझेदारी की बात भी उचित है लेकिन सामाजिक न्याय के नारे को आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ निजी संस्थानों पर नहीं डाली जा सकती.