सोमवार, 10 अप्रैल, 2006 को 23:57 GMT तक के समाचार
पाणिनी आनंद
मेरठ से लौटकर
'अगर प्रशासन वहाँ पर आग रोकने की कोई भी व्यवस्था रखता तो इतनी बड़ी घटना न होती. इसके पीछे प्रशासन की लापरवाही है. इतने बड़े मेले के आयोजन स्थल पर एक भी फ़ायर ब्रिगेड नहीं थी...'
ऐसी न जाने कितनी ही आवाज़ें साफ़ सुनी जा सकती थीं, मेरठ के इस मेला स्थल से लेकर मेडिकल कॉलेज और तमाम चिकित्साघरों तक.
घटनास्थल का नज़ारा रौंगटे खड़े कर देने वाला था. दो पंडाल पूरी तरह से जलकर ख़ाक हो गए थे. प्रशासन ने आग तो बुझा ली थी पर कितनों के घर के चिराग तब तक इस आग की भेंट चढ़ चुके थे.
मेरठ के विक्टोरिया पार्क में इस व्यापार मेले का आयोजन किया गया था. सोमवार को इस मेले के आख़िरी दिन जब यह घटना हुई, उस वक्त वहाँ लोगों की अच्छी ख़ासी भीड़ थी.
मौके पर मौजूद लोगों के मुताबिक आख़िरी दिन के लिए क़रीब 2800 टिकट बेचे गए थे. मेले में बिजली, कपड़े और अन्य कई चीज़ें बनाने वाली कई कंपनियों ने अपने स्टॉल लगाए थे.
घटना के बाद देर रात तक प्रशासन की ओर से क़रीब 45 लोगों के मारे जाने की पुष्टि कर दी गई थी.
मैंने ख़ुद मेडिकल कॉलेज के शवगृह में 30 शवों की गिनती की लेकिन आशंका व्यक्त की जा रही है कि मृतकों की संख्या बढ़ भी सकती है.
कई लोग बुरी तरह से जल गए हैं और इन्हें कई अस्पतालों में जाया गया है.
एक अन्य अस्पताल में पहुँचकर जब मैंने इसका अनुमान लगाना चाहा तो बताया गया कि वहाँ 14 लोग भर्ती हैं जिनमें से कई आधे से ज़्यादा जल चुके हैं.
चिंता की बात यह थी कि मेरठ में जले लोगों के उपचार के लिए पर्याप्त आधुनिक संसाधन अस्पतालों में मौजूद नहीं हैं और कई लोगों को उनके परिजन दिल्ली लेकर भी जा रहे हैं.
असुरक्षित पंडाल
जिन पंडालों में यह मेला चल रहा था, वो सिंथेटिक चादरों से बने थे जो कि अति ज्वलनशील होती हैं.
इसके अलावा मेले के पंडालों से आने-जाने के लिए अपेक्षाकृत छोटे रास्ते रखे गए थे और मेला घूम चुके लोगों के मुताबिक आपातकालीन निकास जैसी कोई व्यवस्था भी इन पंडालों में नहीं थी.
इसके अलावा इतनी बड़ी तादाद में लोगों के हताहत होने की एक वजह यह भी थी कि पंडालों को ठंडा रखने के लिए बड़े-बड़े एयरकंडीशनर लगाए गए थे जिसके कारण पंडाल चारों ओर से बंद थे.
स्थानीय लोगों की मानें तो इस सारी स्थितियों और पंडालों में बिछे बिजली के तारों के जाल ने आग में घी का काम किया होगा और यही कारण था कि मरने वालों की संख्या बढ़ी.
हालांकि प्रशासन की ओर से कोई भी कुछ भी कहने से कतराता रहा और घटना की वजह 'शायद शॉर्ट सक्रिट हो सकती है', बताया जाता रहा.
स्थानीय विधायक, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने प्रशासन पर आरोप लगाते हुए कहा, "मेरे पास इस मेले के आयोजन से संबंधित फ़ाइल लग गई है जिससे पता चलता है कि इस मेले के लिए अग्निशमन विभाग से इजाज़त नहीं मिली थी. इसके बावजूद जिलाधीश ने इसकी अनुमति दी और इसमें शरीक भी हुए."
दर्दनाक मंज़र
कहीं खाने का सामान, कहीं चश्मे और चप्पलें, कहीं किताबें तो कहीं झोले, आग के बाद बची राख में लोगों के साथ कुछ कूड़ा बीनने वाले इसे टटोलते नज़र आ रहे थे.
उधर प्रशासन और लोगों के बीच नोंकझोंक भी चलती रही. लोग प्रशासन और मीडिया, दोनों के ही ख़िलाफ़ नारेबाज़ी कर रहे थे.
हादसे के बाद घटनास्थल पर टीवी चैनलों के जमावड़े से भी लोग ख़ासे परेशान दिखे और उन्होंने मीडियाकर्मियों पर अपना गुस्सा उतारा.
उधर अस्पताल में लोग मृतकों में अपने परिजनों को खोज रहे थे.
आँखों में आंसू लिए कोई किसी शव की अंगूठी के सहारे तो कोई बचे-खुचे कपड़ों के सहारे अपने घर के लोगों को पहचानने की कोशिश कर रहा था.
देर रात जब मैं लौटने लगा तो पानी में भीगे मेला स्थल की ज़मीन से जलने की गंध और घुटन भरी गर्माहट उठ रही थी.
इस पंडाल को पानी की बौछारों से बुझा चुके प्रशासन को शायद इस घटना के कारणों को तलाशने में काफ़ी वक्त लगने वाला है और लोगों को इससे हुए नकसान से उबारने में शायद उससे भी कहीं ज़्यादा.