शनिवार, 08 अप्रैल, 2006 को 11:07 GMT तक के समाचार
भारत में उच्च शिक्षा के केंद्रीय संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण दिए जाने के सवाल पर एक नया विवाद खड़ा हो गया है.
केंद्र सरकार की ओर से प्रस्ताव है कि इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी (आईआईटी) और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट (आईआईएम) जैसे संस्थानों में वर्तमान में दिए जा रहे आरक्षण की सीमा को 22.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 47.5 प्रतिशत तक कर दिया जाए.
छात्रों और बुद्धिजीवियों के कई संगठनों ने इस प्रस्ताव का विरोध शुरू कर दिया है लेकिन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने स्पष्ट कर दिया है कि संविधान के 93 वें संशोधन के तहत ये प्रावधान करना ही होगा.
विरोध और जवाब
केंद्रीय उच्च शिक्षा संस्थानों में इस समय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए (22.5 प्रतिशत) आरक्षण का प्रावधान है.
अब सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के लिए भी आरक्षण का प्रावधान करना चाहती है.
संभावना है कि इसके लिए एक प्रस्ताव विधानसभा चुनावों के बाद मंत्रिमंडल के सामने रखा जाएगा.
लेकिन इस प्रस्ताव की ख़बरें आते ही देश में एक बार फिर विरोध शुरू हो गया है. छात्र संगठनों के अलावा कई बुद्धिजीवियों ने इसका विरोध किया है.
उनका कहना है कि इससे उच्च वर्ग के योग्य छात्रों के रास्ते बंद हो जाएँगे.
लेकिन इस विरोध को ख़ारिज करते हुए केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह ने कहा है, "संविधान संशोधन को संसद में लगभग सर्वसम्मति से पारित किया गया था और सरकार संसद और संविधान से बंधी हुई है."
उन्होंने शुक्रवार को पत्रकारों से बात करते हुए यह भी कहा कि सरकार जल्दी ही निजी संस्थानों में भी आरक्षण के लिए एक विधेयक ला सकती है.
इस बीच एक प्रस्ताव ये भी आया है कि आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों में यदि आरक्षण देना सरकार की मजबूरी ही है तो आरक्षण के दायरे से बाहर के छात्रों के लिए इन संस्थानों में सीटें बढ़ाई जानी चाहिए.
सरकार ने सीटें बढ़ाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया है, हालाँकि इन संस्थानों के संसाधनों को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं.
ग़ौरतलब है कि इस समय शिक्षा और नौकरियों में पिछड़े वर्ग के आवेदकों को आरक्षण देने की शुरुआत 15 साल पहले मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करते हुए की गई थी.
उस समय देश भर में इसका बड़ा विरोध हुआ था और छात्रों के आक्रामक आंदोलन भी हुए थे.