सोमवार, 03 अप्रैल, 2006 को 11:51 GMT तक के समाचार
पारुल अग्रवाल
छात्र, मास कम्यूनिकेशन रिसर्च सेंटर-जामिया मिलिया, दिल्ली
सिनेमा और भाषा का गठजोड़, दृश्य और विचारों का गठजोड़ है. सिनेमा की रुपहली दुनिया दृश्यों के माध्यम से एक बिंब प्रस्तुत करती है और संवादों में बुने शब्द मस्तिष्क में बिंबों की एक दूसरी दुनिया रचते हैं.
हिंदी सिनेमा ने इस बाबत हिंदी भाषा को एक नया रचनात्मक मुहावरा दिया है. भारत में भाषा को महसूस करने और देखने की प्रक्रिया की शुरुआत का श्रेय हिंदी सिनेमा को दिया जा सकता है.
पाकिस्तान, ब्रिटेन, अरुणाचल, तमिलनाडु या नेपाल, राज्य और राष्ट्र की सीमाओं से परे हिंदी फ़िल्में भाषा की सरहद को पार कर एक नए क़िस्म का जुड़ाव पैदा करती हैं.
यही कारण है कि हिंदी भाषा के भीतर भी फ़िल्मों के गणित ने नई हलचल पैदा की. भाषा के पांडित्य को तोड़ने और उसे आम आदमी के दायरे में लाने का श्रेय सिनेमा जैसे कलात्मक माध्यमों को जाता है.
जो लोग भाषा के दायरे तय करने में विश्वास रखते हैं, उनका आरोप है कि फ़िल्मों ने हिंदी की गरिमा को नष्ट किया है.
ये उसी तरह है जैसे खुले आसमान के नीचे बहते दरिया पर कोई जाल बिछाकर उसे आसपास की चीजों से सुरक्षित रखना चाहे.
उतार-चढ़ाव
हिंदी का अस्तित्व भारतीय समाज से अलग न था, न है, न हो सकता है.
यही कारण है कि जिस उतार-चढ़ाव की प्रक्रिया से हमारा समाज गुज़रा है, उसी से फ़िल्में और भाषा भी गुज़रीं.
हिंदी फ़िल्मों ने हिंदी को लोगों से शाब्दिक और सांस्कृतिक तौर पर जोड़ा है. 'कॉम्पोसिट कल्चर’ का अस्तित्व पूरी तरह से इस प्रयास पर ही टिका है.
हालांकि इस प्रक्रिया में कुछ ग़लतियां भी हुईं लेकिन हिंदी के विकास और प्रचार के लिहाज से यह घाटे का सौदा नहीं है.
हिंदी की समृद्धि में फ़िल्मों के योगदान का मूल्यांकन तभी संभव है जब हम सभ्यता, भाषा और सिनेमा को एक-दूसरे का पूरक और आईना मानें.