सोमवार, 03 अप्रैल, 2006 को 11:54 GMT तक के समाचार
देवेन्द्र साहू
छात्र, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय-भोपाल
तकनीक अर्थात सुविधा की ओर गमन. विज्ञान का श्रेष्ठतम प्रयोग. मनुष्य का अपने आदिम युग से मानव युग तक का सफ़र तकनीक पर ही टिका हुआ है.
ऍनालॉग से डिजिटल युग की क्रांति तक का सफ़र विभिन्न तकनीकों के प्रयोग से ही तय किया जा सका है.
भौतिकवाद का अस्तित्व, विकास एवं बाज़ार का एक विशाल रूप तकनीक का प्रतिफल है. वहीं पत्रकारिता, लोगों के अनुभवों को ज्ञान में बदलती है. रोज़मर्रा की घटनाएं, सूचनाएं और विश्लेषण को जन-जन तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है.
18वीं सदी में अपने उदय के बाद से ही पत्रकारिता तकनीक के रथ पर सवार होकर चली है और कई मील के पत्थर स्थापित किए हैं.
इसी को मिलाकर वर्तमान जिस युग को जी रहा है वह है सूचना प्रौद्योगिकी का युग.
इस युग का सूत्रपात मन की तरंगों को मस्तिष्क में ले जाकर उसे भौतिक रूप में ज़रूरत बना देना ही माना गया है.
समाज की दैनिक प्रक्रियाओं का उतार-चढ़ाव एवं घटनाक्रम में समस्याएं एवं उनके निराकरण के प्रयास हमेशा से चलते रहे हैं. असमानताएं एवं समानताएं बराबर रही हैं. पाप-पुण्य की धूप-छांव होती रही है.
कुल मिलाकर सिक्के का एक पहलू कभी नहीं हो सकता. इन्हीं दोनों पहलुओं पर नज़र रखने का कार्य पत्रकारिता का है.
इसके बीच से तकनीक का सहारा लेकर सिक्के के बीच की गतिविधियां खोजी पत्रकारिता अथवा ग़ैर परंपरागत विधा के रूप में सामने आई है. ये हमेशा से चुनौती थी परंतु तकनीक ने इसे काफ़ी हद तक हल किया है.
बड़ी-बड़ी क्रांतियां कैमरे में क़ैद नहीं हुईं परंतु घोटाले जब कैमरे की क़ैद से खुले तो वह भी मानव इतिहास में क्रांति से कम नहीं थे.
भारतीय परिप्रेक्ष्य में चाहे यह तहलका डॉट कॉम हो या कोबरा पोस्ट डॉट कॉम, निश्चित रूप से पत्रकारिता के क्षेत्र में इससे चुनौतियां बढ़ी हैं.
चुनौतियां
इसका कारण है कि नई तकनीक ने परंपरागत पत्रकारिता की जहां एक ओर बेहद सहायता की, वहीं दूसरी ओर उसके ऊपर अतिक्रमण का प्रयास भी किया. प्रतियोगिता को बढ़ाया, अनछुए पहलुओं को उजागर किया परंतु डिजीटल डिवाइड की खाई भी पनपने दी.
हर संसाधन की तरह पत्रकारिता को भी पूंजीपतियों के हाथ में सौंप दिया गया.
मिशन से सेंसेशन तक का सफ़र नई तकनीक का ही परिणाम है.
अब चुनौती यह है कि जब 'टॉरगेट ऑडियंस' की बात चल रही हो, विकास के मापदंडों में अंतर हो एवं सबसे तेज़ पहुंचाने का दबाव हो तब अपने मिशन को पत्रकारिता कैसे क़ायम रखें क्योंकि इस सबकी वजह तकनीक ही है.
यह नई तकनीक का सकारात्मक उपयोग ही है कि समाज का कचरा दिख पा रहा है.
पहले भी बंद कमरों में जो कुछ घृणित घटा वह सामने नहीं आ पाया पर अब जो सामने आ रहा है उसे लोग पचा नहीं पा रहे हैं.
तकनीक एवं संवेदना का सामंजस्य ही पत्रकारिता के माध्यम से विश्व की नाव खेने का साधन बन सकता है क्योंकि जहां कहीं विज्ञान वरदान के रूप में होता है, वहीं उसकी खोह में अभिशाप भी पनप रहा होता है.
आईने के माध्यम से दाग देखा जा सकता है पर दूर करने के लिए ज़रूरी दवा कहां से लाएं?
पत्रकारिता ने नई तकनीक के प्रयोग से छुपे हुए दाग दिखाने का कार्य किया है पर चुनौती यह है कि क्या यह क्षेत्र उनका उपचार करने के लिए भी किसी तकनीक का सहारा लेगा.