सोमवार, 03 अप्रैल, 2006 को 11:55 GMT तक के समाचार
नियति वर्मा
छात्र, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय-भोपाल
'खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो
जब तोप मुक़ाबिल हो, अख़बार निकालो'
ये पंक्तियां आज भले ही बेमानी प्रतीत होती हों पर एक समय था जब यह पत्रकारिता की बाइबिल समझी जाती थीं.
तब पत्रकारिता को एक प्रोफ़ेशन नहीं मिशन समझा जाता था और जिसके उद्वेग से उद्वेलित हो संपूर्ण देश व समाज एक दिशा में बहता चला जाता था.
जैसे-जैसे तकनीकी विकास होते गए, नित्य नए आयाम बनते-बिगड़ते रहे और धीरे-धीरे पत्रकारिता का स्वरूप परिवर्तित होता चला गया.
आज हम सूचना क्रांति के दौर से गुज़र रहे हैं. एक ऐसे वैश्विक समाज में अपना अस्तित्व गढ़ने और तराशने का मिथक प्रयास कर रहे हैं जहां सूचना ही शक्ति है.
बल्कि यूं कहें कि जो सूचना का जल्दी-से-जल्दी अधिकारी होता है वही सही मायने में शक्ति संपन्न है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी.
पीठिका
प्रारंभ में पत्रकारिता के रूप में केवल और केवल लेखन माध्यम का वर्चस्व था, फिर श्रव्य माध्यम और दृश्य-श्रव्य माध्यमों का आगमन हुआ और उसके बाद तकनीकी विकास के सापेक्ष इंटरनेट पत्रकारिता पुष्पित-पल्लवित होती हुई सफलता के सोपान चढ़ती चली गई.
पत्रकारिता का प्रकाशन के साथ शुरू हुआ सफ़र, प्रसारण के चरम पर पहुंचा. आज 'ब्रॉडकास्टिंग' की दुनिया 'वेबकास्टिंग' के दौर में पहुंच गई है.
यह सारी उपलब्धियां नई तकनीकों के आविष्कार और उनके अनुप्रयोगों का परिणाम ही तो हैं.
नई तकनीक के विकास और विस्तार ने पत्रकारिता के क्षेत्र में जहां एक ओर कई सहज व सुलभ साधन उपलब्ध कराए, जिनसे ख़बरों के द्रुतगामी एवं विश्वसनीय प्रकाशन-प्रसारण का मार्ग प्रशस्त हुआ, वहीं दूसरी ओर पत्रकारिता के समक्ष कई नई चुनौतियों को भी खड़ा कर दिया.
तकनीकी क्षमता के सापेक्ष ख़बरों को सटीक रूप से समग्रता के साथ पाठकों-दर्शकों अथवा श्रोताओं के समक्ष रख पाना आज पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है.
अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा
समाचार पत्र हों या समाचार चैनल या कोई अन्य माध्यम, सभी अपने पाठकों तक एक नई और एक्सक्लूसिव ख़बर के साथ अपनी पहुंच बनाना चाहते हैं और यही कारण है कि आज की पत्रकारिता सनसनीखेज पत्रकारिता का पर्याय बनकर रह गई है.
समाचार माध्यम ऊल-जलूल ख़बरें परोस रहे हैं. एक ही ख़बर को बार-बार प्रसारित करना समाचार चैनलों की मजबूरी बन चुकी है.
समाचार पत्रों की प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए और चैनलों की टीआरपी रेटिंग में बढ़ोत्तरी के लिए स्टिंग ऑपरेशन जैसे प्रयास भी किए जा रहे हैं.
वर्तमान में पत्रकारिता की चुनौतियां उसकी स्वयं की समस्याएं बन चुकी हैं जिसका निदान यदि जल्द ही न किया गया तो पत्रकारिता एक ऐसी व्यूह रचना में उलझ कर रह जाएगी जिसे भेद पाना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव होगा.
इससे पहले कि तकनीकी दक्षता के बल पर सफलता के मिथ्या अभिमान से ग्रसित पत्रकारिता, व्यावसायिक व्योम में कहीं खो जाए, आवश्यकता है एक ऐसे तारे की जो इस तिमिर में उसे उचित मार्ग का ज्ञान करा पाए.