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रविवार, 02 अप्रैल, 2006 को 03:50 GMT तक के समाचार

फ़ैसल मोहम्मद अली
बीबीसी संवाददाता, छत्तीसगढ़ से

छत्तीसगढ़ की नक्सल समस्या

छब्बीस साल पहले पीपुल्स वार ग्रुप के नेता कोंडापल्ली सीतारमैया ने एक छोटा दल आंध्र प्रदेश की सीमा से लगे छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाक़े में भेजा था ताकि आंध्र में पुलिस दबाव की स्थिति में वहाँ शरण मिल सके.

अब यह इलाक़ा नक्सलवादियों के इस क्षेत्र के सबसे मज़बूत ठिकानों में से एक है.

दो साल पहले भारत के कई माओवादी गुटों के विलय के बाद बनी नई पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने भारत का अपना सबसे पहला ‘बेस कैंप’ अबूझमाड़ में बनाने का विचार किया.

मध्यप्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक एएन सिंह कहते हैं कि यह इलाक़ा 40 हज़ार वर्ग किलोमीटर में फैला है. घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरा होने के कारण यह सुरक्षा बलों के लिए काफ़ी दिक्कतें पैदा करता है.

‘अबूझ’ का मतलब ही है जो समझ में न आ सके.

छत्तीसगढ़ के उत्तरी इलाक़े यानी सरगुजा क्षेत्र में पीडब्ल्यूजी का उतना प्रभाव नहीं था.

जबकि बिहार और अब जो इलाक़ा झारखंड कहलाता है, उसमें माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर या एमसीसी अधिक सक्रिय था. सरगुजा क्षेत्र झारखंड की सीमा से लगा है.

चूंकि पीडब्ल्यूजी इस इलाक़े् में पैर पसारने की कोशिश कर रहा था इसलिए उसके और एमसीसी के लोगों में अक्सर खूनी झड़पें भी होती थीं.

इन दोनों माओवादी दलों के विलय के बाद इनका कार्यक्षेत्र सिर्फ छत्तीसगढ़ से सुदूर दक्षिणी बस्तर से लेकर उत्तरी इलाके सरगुजा तक फैल गया है.

छत्तीसगढ़ पुलिस महानिदेशक ओपी राठौर कहते हैं कि अब पुलिस की ताकत को एक जगह एकत्रित न होने देने और उनका ध्यान कई स्थानों पर बाँटने के उद्देश्य से नक्सली योजनाबद्ध तरीके से एक ही साथ कई जगह हमले करते हैं.

राज्य सरकार के अनुसार छत्तीसगढ़ के कुल 16 ज़िलों में से आठ- बस्तर, दंतेवाड़ा, कांकेर, राजनंदगाँव, सरगुजा, कवर्धा, जशपुरनगर और कोरिया नक्सल प्रभावित हैं.

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के मुताबिक़ नक्सलवादी वैसे राज्य के सभी ज़िलों में अपनी पाँव पसार चुके हैं.

दिक्कतें

गृहमंत्री राम विचार नेताम के अनुसार छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्यों, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा और झारखंड में भी नक्सल प्रभाव होने के कारण इनके ख़िलाफ़ प्रशासनिक कार्रवाइयों में दिक्कतें आती हैं.

नक्सली बस्तर या सरगुजा में किसी वारदात को अंजाम देने के बाद पड़ोसी राज्यों में घुस जाते हैं.

छत्तीसगढ़ के पूर्व गृह मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के कार्यकाल में केंद्रीय गृह मंत्रालय के सामने यह सुझाव रखा गया था कि सभी नक्सल प्रभावित राज्यों की एक समन्वय समिति बनाई जाए जो सुरक्षा की दृष्टि से मिलकर काम कर सकें.

केंद्र सरकार ने एक समिति तो गठित की है लेकिन उसका दायरा प्रशासनिक समन्वय तक ही सीमित है.

सुरक्षा की दृष्टि से विद्रोहियों के ख़िलाफ़ कारवाई करने में भी छत्तीसगढ़ की अपनी दिक्कतें हैं. सुरक्षा बलों की बड़े स्तर पर कमी है.

पूर्व पुलिस महानिदेशक एएन सिंह कहते हैं कि माओवादियों से लड़ने के लिए सरकार को विशेष पुलिस दस्ते तैयार करने होंगे जो गुरिल्ला युद्ध में दक्ष हों.

विद्रोही पुलिस और प्रशासन के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई में इसी प्रणाली का इस्तेमाल करते हैं.

सलवा जुड़ूम

पिछले जून से राज्य के दंतेवाड़ा ज़िले में सरकार के समर्थन से एक नक्सल विरोधी कार्यक्रम सलवा जुड़ूम चलाया जा रहा है.

इस कार्यक्रम के दौरान एक साथ कई गाँवों के लोग जमा होते हैं और अपने-अपने गाँवों में मौजूद नक्सली-समर्थकों अथवा सदस्यों को चिन्हित करते हैं.

प्रशासन का मानना है कि जनता का यह नक्सल विरोधी आंदोलन खुद ब खुद ही विद्रोहियों के तंत्र को तोड़ देगा जो उन्होंने गाँव-गाँव में गठित कर रखा है.

बस्तर पुलिस महानिरीक्षक एम डब्ल्यू अंसारी कहते हैं,'' हम लगभग चार हज़ार ग्रामीणों को विशेष पुलिस अधिकारी के तौर पर नियुक्त करने की प्रक्रिया में हैं. वे ट्रेनिंग के बाद सुरक्षा व्यवस्था में पुलिस की मदद के साथ-साथ सूचना जुटाने का काम भी करेंगे.''

सलवा जुड़ूम के शुरू होने के बाद नक्सलवादियों ने आम लोगों पर अपने हमले तेज़ कर दिए हैं और एक साल में लगभग डेढ़ सौ से अधिक आम लोग नक्सली हिंसा का शिकार हुए हैं.

कहा जा रहा है कि सरकार सलवा जुड़ूम को इसलिए भी समर्थन दे पा रही है क्योंकि बस्तर में मौजूद बेहतर आर्थिक स्थिति वाला एक आदिवासी वर्ग इसके समर्थन में है.

नक्सल समस्या के जानकार रुचिर गर्ग कहते हैं कि हालाँकि यह बात मुख्यतः नक्सलवादियों द्वारा उठाई जाती है. लेकिन यह सच है कि बस्तर में आदिवासियों का एक ऐसा वर्ग उभरा है जिसके लिए विकास के पैमाने अन्य मध्यमवर्गीय लोगों जैसे ही हैं.

लेकिन बस्तर के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहलुओं पर कई किताबें लिख चुके हीरालाल शुक्ल कहते हैं कि नक्सलवाद की समस्या सिर्फ सुरक्षा की दृष्टि से उठाए गए क़दमों से खत्म नहीं होगी.

उनका मानना है कि राजनीतिज्ञ, अधिकारी और व्यापारी वर्ग के शोषण के कारण आदिवासी इस व्यवस्था में भरोसा खो चुका है और नक्सली उनके इसी शोषण का निदान ढूंढ़ने की बात करते हैं इसलिए वे उसे अपना पक्षधर समझते हैं.