सोमवार, 27 मार्च, 2006 को 15:49 GMT तक के समाचार
नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता, जयपुर से
बम धमाकों और फौजी बूटों की पदचाप के बीच कश्मीर की घाटी में उनका प्यार परवान चढ़ा. लेकिन 22 वर्षीय पाकिस्तानी युवक मुराद और बारामूला ज़िले की नसीमा को मुहब्बत के बहुत कठिन इम्तिहान से गुज़रना पड़ रहा है.
कभी अलगाववादी गतिविधियों में सक्रिय रहे मुराद ने हथियार फेंके और नसीमा का हाथ थामा और पाकिस्तान की राह पकड़ी.
मगर यह राह इतनी आसान नहीं थी. एक साल पहले मुराद और नसीमा को राजस्थान के सीमावर्ती मुनाबाओ क्षेत्र में पाकिस्तान जाने की कोशिश करते हुए सुरक्षा बलों ने पकड़ लिया.
बाड़मेर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने मुराद को विदेशी अधिनियम में तीन साल की सज़ा से दंडित किया है. नसीमा को अदालत ने 11 माह की सज़ा और 700 रुपए के जुर्माने की सज़ा सुनाई है. नसीमा पर एक विदेशी की सहायता करने और भारत पाकिस्तान सीमा पर प्रतिबंधित क्षेत्र में घुसने का आरोप था.
नसीमा ने जेल में ग्यारह महीने गुज़ार लिए हैं. लेकिन 700 रुपए का जुर्माना जमा न करने पर उन्हें एक माह और जेल में बिताना होगा.
सरकारी वकील हरि सिंह के मुताबिक मुराद पेशावर के धीर के रहने वाले हैं, जबकि नसीमा बारामूला में स्थित अरागम की है. उनके ख़िलाफ़ दर्ज एफ़आईआर के मुताबिक मुराद 1997 में कश्मीर में दाखिल हुए और वे अल बदर संगठन के सदस्य रहे.
इन दोनों के वकील कन्हैया लाल जैन का दावा है कि मुराद भारतीय कश्मीर के ही रहने वाले हैं. लेकिन वे अदालत में इसे साबित नहीं कर सके. गिरफ़्तारी के बाद नसीमा बहुत भावुक थी और मुराद के साथ न रखे जाने पर उन्होंने आत्महत्या करने की धमकी दी. उन्हें बहुत मुश्किल से समझाया गया.
दूसरी ओर अब तक नसीमा के रिश्तेदारों ने उनकी सुध नहीं ली है. उनके वकील कहते हैं कि नसीमा के परिजन ग़रीब है और राजस्थान आना उनके लिए संभव नहीं.
उनके वकील जैन के मुताबिक मुराद ने हथियार त्यागने के बाद भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की कश्मीर में मदद की है. इसलिए अल बदर ने उस पर दो लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा है.
मानवाधिकार कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव कहती हैं, "भारत और पाकिस्तान को सहृदयता दिखाकर मुराद और नसीमा को घर बसाने का मौका देना चाहिए. दोनों देशों के जटिल नियमों की वजह से अनेक मुराद और नसीमा जेलों में बंद रहने पर विवश हैं."
मुराद और नसीमा की आँखों में अब भी सुनहरे भविष्य के सपने हैं. लेकिन राजनीति जब धरती पर सरहद की लकीरें खींचती है तो वो न तो मुराद की मुहब्बत देखती है और न ही किसी बेबस नसीमा का नसीब.