गुरुवार, 23 मार्च, 2006 को 10:34 GMT तक के समाचार
'लाभ के पद' के विवाद के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लोकसभा की सदस्यता और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़े की घोषणा की है.
इसके पहले उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी और कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं से मुलाक़ात की.
सोनिया गांधी का कहना था,'' दो दिनों से देश में कुछ लोग ऐसा माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं जैसे सरकार और संसद का उपयोग केवल मेरी तरफ़दारी के लिए हो रहा है. इससे मुझे बहुत दुख पहुँचा है.''
सोनिया ने मीडिया के सामने कहा,'' मैं पहले भी कहा चुकी हूँ कि मैं राजनीति और सार्वजनिक जीवन में किसी निजी स्वार्थ के लिए नहीं आई. मैने देश और भारतीय समाज की सेवा और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा का संकल्प लिया है.''
उन्होंने घोषणा की, ''इसलिए, मैं सार्वजनिक जीवन और राजनीति के आदर्शों और उसूलों के अनुरूप लोकसभा की सदस्यता से त्यागपत्र देती हूँ."
उन्होंने कहा, ''मुझे पूरा भरोसा है कि रायबरेली के लोग और पूरा देश मेरी इस भावना को समझेगा.'' साथ ही सोनिया गांधी ने घोषणा की कि वो रायबरेली से दोबारा चुनाव लड़ेंगी.
इसके पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने 'लाभ के पद' को फिर से परिभाषित करने के लिए क़ानून बनाने का समर्थन करते हुए कहा है कि संसद को ही ऐसा करने का अधिकार है.
यूपीए सरकार को समर्थन दे रही सीपीएम का यह समर्थन ऐसे समय में आया है जब चर्चा चल रही है कि संसद का सत्र अचानक ख़त्म कर यूपीए सरकार इसके लिए एक अध्यादेश लाना चाह रही है.
विपक्ष ने आरोप लगाया था कि सोनिया गांधी सहित कई प्रमुख सांसदों की सदस्यता बचाने के लिए सरकार ऐसा कर रही है.
उल्लेखनीय है कि समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन की सदस्यता समाप्त किए जाने के बाद कथित तौर पर 'लाभ के पद' पर बैठे 44 सांसदों के ख़िलाफ़ शिकायतें राष्ट्रपति के पास पहुँच गई हैं.
इनमें सोनिया गाँधी, कर्ण सिंह से लेकर सोमनाथ चटर्जी तक कई महत्वपूर्ण नाम शामिल हैं.
अध्यादेश की चर्चा
इस बीच यह चर्चा चल ही रही है कि यूपीए सरकार एक अध्यादेश लाकर कई महत्वपूर्ण सांसदों की सदस्यता बचाने में लगी हुई है.
माना जा रहा है कि यूपीए सरकार चाहती है कि इस तकनीकी दिक्क़त को दूर करने के लिए एक क़ानून बनाकर कुछ पदों को लाभ के पद से अलग कर दिया जाए.
इसके लिए सरकार एक अध्यादेश लाना चाहती है. संविधान की धारा 123 के अनुसार अध्यादेश लाने के लिए ज़रूरी है कि संसद का सत्र न चल रहा हो.
यदि परंपरा के अनुसार बजट सत्र का सत्रावकाश होता तो सरकार अध्यादेश नहीं ला सकती थी क्योंकि इसे तकनीकी रुप से माना जाता है कि संसद का सत्र जारी है. इसलिए सरकार ने कामकाज न होने का तर्क देकर सत्रावसान कर दिया है.
अब यूपीए सरकार अध्यादेश लाने के लिए स्वतंत्र हो गई है जिसे छह महीने के भीतर कभी भी संसद में रखकर पास करवाना होगा. हालांकि अध्यादेश के मामले में सरकार ने अभी चुप्पी साधी हुई है.
इसे लेकर बुधवार को संसद में विपक्ष की ओर से जमकर हंगामा किया गया था और दोनों सदनों की बैठकें कई बार स्थगित करनी पड़ी थी.