मंगलवार, 04 अप्रैल, 2006 को 13:29 GMT तक के समाचार
(बिंदास बाबू की डायरी)
भाजपा में बूढे लोगों की महिमा निराली है. वे अक्सर बच्चों के मनोरंजन की खातिर कुछ न कुछ करते रहते हैं.
जिंदा रहने के लिए हाथपैर चलाते रहने होते हैं. जब अक्ल सठिया जाए घुटने गठिया जाएं तो ज़्यादा हिलना डुलना पड़ता है. इस तरह भाजपा के लोग स्वास्थ्य टूरिज्म की राजनीति करते हैं.
जब तक हूक उठती है. अतीत के महान दिन याद आते हैं. तो एक यात्री अपनी टॉयटा में तेल भरवाकर यात्रा करने लगता है.
यात्रा का नाम कुछ भी हो सकता है. जोड़ू यात्रा, जुगाड़ यात्रा, तोड़ू यात्रा. नाम कुछ भी हो भाव को समझे.
इससे नेता और टूर गाइड का फ़र्क मिट जाता है. जो काम कोई गाइड पाँच- दस रुपए में करता भाजपा में आडवाणी जी के जिम्मे आया है. तकदीर की बात ठहरी.
यात्रा करने से गठिया, ब्लडप्रेशर सब ठीक हो जाता है. सड़कों के खड्डों के मारक झटकों से दुखती कमर सीधी हो जाती है.
हिंदुत्व में ‘एक पंथ कई काज’ का बड़ा महात्म्य है. ‘फिसल पड़े तो हर गंगा की’ कहावत इसी तरह बनी. यात्रा होगी स्वास्थ्य लाभ होगा और नेतागिरी बनेगी.
लेकिन जरा देखो तो इन निकम्मे ‘नई उम्र की नई फसलों को’ सुषमा, प्रमोद, अरुण जेटली आदि को.
डालडा की पीढी हैं. दम नहीं है. एक बार भी यात्रा की नहीं सोचते. असली घी में पले बूढे सोचते हैं.
कई कतारें
भाजपा में वृद्धजनों की कई कतारें हैं. उनमें से ‘पतझर के पीपल के अटके हुए पत्ते’ की मानिंद खुराना साहब नज़र आते हैं.
उन्हें अतीत की दिल्ली की हुडक उठी नहीं कि वे पार्टी को एकाध लात लगा देते हैं. पार्टी नियम पूर्वक उन्हें निलंबित करती है वे फिर कुछ दिन बाद माफी माँग कर बुलबुल की तरह परिवार में गाना गाने लगते हैं.
इस बार वे उमा की रैली के रेले में बह जाना चाहते हैं. पार्टी ने कहा बह जा सिर मत खा.
भाजपा को जर्जरता का रोग लग गया है. बड़ी मुश्किल से 80 के आसपास टहल रहे आडवाणी खिसके.
अटल खिसके वरना जमे बैठे थे. परिवारों में बूढे लोग जब वानप्रस्थी नहीं होते संन्यास नहीं लेते और मरते नहीं तो बड़ा खून चूसते हैं.
उनके बाल बच्चों से पूछो तो कहते मिलेंगे साला डोकरा मरता ही नहीं कब पीछा छोड़ेगा. अरे टले तो हमें भी कुछ करने को मिले. डोकरा हिलता ही नहीं.
हिंदुत्व एक आकुल व्याकुल संयुक्त महान परिवार है. उसमें डोकरों की कलह है. डोकर जोकर नजर आते हैं.
यहाँ भी हिंदुत्ववादी परिवार ने एक नया फ्रेश आइटम दिया है. परिवार में बूढे मचलते हैं, बच्चे गमगीन रहते हैं.
आडवाणी जिन्ना की मजार पर मचल गए. बहुत मार खाई मगर मचले रहे. खुराना भी हर छह महीने बाद डोकर-लीला करते रहते हैं.
डोकर समझके सब माफ़ कर देते हैं. यह बूढे लोगों की चतुराई है. सारी जवानी भोगते लेकिन कामना नहीं मरी.
जितनी भारतीय संस्कृति पढ़ी जितनी कामना को कंट्रोल में रखने की बात की उतनी ही कामना की कैद में बंद होते गए.
भाजपा के बुजुर्गों की तालठोकूं कलह को देखकर ऐसा लगता है कि डोकर लोगों की किसी ने जवानी की दवाई पिला दी है. वे ‘एस्टरिक्स’ के चरित्रों की तरह फू-फा करते दिखते हैं.
कभी कभी भाजपा को देखकर बाबर्ची फ़िल्म की याद आती है जिसमें एक बुड्ढा एक बक्से को कब्ज़े में रखे है. लोग समझते हैं कि उसमें बड़ा माल है. बक्से की हिफाजत करता हुआ डोकरा अपनी पूजा कराता रहता है.
सब उस बक्से पर नज़र लगाए रहते हैं. जब उसकी चोरी हो जाती है तो चोर को वह खाली मिलता है.
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