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शुक्रवार, 10 मार्च, 2006 को 18:39 GMT तक के समाचार

काशीनाथ सिंह
वाराणसी वासी प्रख्यात लेखक

बनारसी रंग दहशत के रंग से गहरा

बनारस में विस्फ़ोट करने वालों से मैं कहना चाहता हूँ कि अगर उनका मकसद लोगों के बीच दहशतगर्दी पैदा करना था, उन्होंने सोचा हो कि इससे लोग डरेंगे, भयभीत होंगे तो इस लिहाज से उन्होंने ग़लत जगह चुन ली ऐसा काम करने के लिए.

बनारस पर उसका कोई असर नहीं पड़ने वाला है.

यह नगर जैसा था, वैसा ही रहेगा. गंगा वैसे ही बह रही हैं, मंदिरों में वैसे ही घंटियां गूँज रही हैं और सड़कों पर वैसी ही निर्भीक होकर लोग चल रहे हैं.

होली का मौसम है. ख़रीद-फ़रोख़्त जारी है. लोग रंग-अबीर-गुलाल ख़रीद रहे हैं. कोई फ़र्क पड़ता नज़र नहीं आ रहा है.

बनारस तो इस मूड में रहता है कि दुनिया रहे न रहे, यह नगर रहेगा. परंपराएं चलती रहेंगी.

यह वो शहर है जहाँ ठेलुआ क्लब होता था, उलूक नाम की पत्रिका निकलती थी और मज़ाक-हंसी को सामाजिक मान्यता प्राप्त थी. भारतेंदु का नगर है यह.

हंसी-ठहाके, मस्ती करने और घाटों पर घूमते हुए मज़े करने के कितने ही बहाने हैं लोगों के पास.

विस्फ़ोटक राजनीति

बनारस में जब विस्फ़ोट हुए, लोगों की जानें गईं, कितने ही लोग घायल हुए, तब तक तो दुर्घटना का सांप्रदायिकता से कोई लेना-देना नहीं था.

घटना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिशें शुरू हुईं अगली सुबह से जब कई राजनीतिक दलों के लोगों ने आना शुरू किया.

इसका एक कारण यह भी है कि इसी एक वर्ष में राज्य में कई चुनाव होने हैं.

दूसरा चिंता का विषय यह भी है कि ज़्यादा अहमियत दी जा रही है संकटमोचन पर हुए बम कांड को जबकि वाराणसी रेलवे स्टेशन पर इन धमाकों से मरने और घायल होने वालों की तादाद ज़्यादा रही है.

स्टेशन पर प्रभावितों की संख्या का भी सही अनुमान नहीं है पर यह धार्मिक स्थल था इसलिए स्टेशन की घटना को नज़रअंदाज़ किया गया.

पर यह बनारस की ख़ासियत है कि इस दौरान बनारस होली के मूड में रहता है. घटना की अगली सुबह भी था और अब भी है.

असल बात तो यह है कि बनारस में भय जैसी कोई चीज़ ही नहीं है. न तो मुसलमानों में और न ही हिंदुओं में.

जब विस्फ़ोट हुआ तो मदनपुरा के मुसलमान भाइयों का सिर शर्म से झुक गया इसलिए कि विस्फ़ोट करने वालों का नाम उनके संप्रदाय से जोड़ा जाएगा.

हाँ मगर बनारस यह बख़ूबी समझता है कि विस्फ़ोट करने वाले इस्लाम के भी दुश्मन हैं और इंसानियत के तो हैं ही.

बनारसीपन

यह वह नगर है जहाँ शव यात्रा में बच्चे कहते हैं, 'राम नाम सत्य है, मुर्दा....मस्त है'. लोग शवयात्रा भी ढोल-नगाड़ों और बैंड-बाजों से साथ निकालते हैं. लोग गाते हुए जाते हैं.

मरना और जीना इस शहर के लिए एक जैसी चीज़ें है. शहर ज्यों का त्यों है. कहीं से किसी के भीतर कोई डर नहीं है.

यहाँ के बारे में यह ग़लत धारणा है कि यह हिंदुओं का ही तीर्थ स्थल है. ध्यान दिला दूँ कि बनारस के ही एक शायर हुए हैं नज़ीर बनारसी, जिन्होंने बनारस को काबा-ए-हिंदुस्तान कहा था.

यानी यह नगर जितना महत्वपूर्ण हिंदू के लिए है, उससे कम महत्वपूर्ण मुसलमानों के लिए नहीं है.

उनका एक शेर याद आता है-

हमने तो नमाज़ें भी पढ़ी हैं अक्सर,
गंगा के पानी में वज़ू कर-कर के

बनारस के रहने वाले, इसे गंगा का पानी कहिए या शिव का स्वभाव, जो एक ऐसा अलमस्त रहने वाला प्रतिमान है, जिसकी नज़र में सब बराबर है और यही स्वभाव यहाँ के लोगों को मिला हुआ है.

फिर वे शायर रहे हों या कवि, मस्ती सब जगह रही है और उनका इस सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना में काफ़ी बड़ा योगदान है.

('काशी का अस्सी' लेखक की कई प्रख्यात रचनाओं में से एक है)

(पाणिनी आनंद के साथ बातचीत पर आधारित)