मंगलवार, 07 मार्च, 2006 को 15:05 GMT तक के समाचार
अपूर्व कृष्ण
बीबीसी संवाददाता
मंदिरों की नगरी वाराणसी में मंदिर तो गली-गली मिल जाते हैं लेकिन शहर के कुछ मंदिर ऐसे हैं जिनका माहात्म्य विशेष अर्थ रखता है जो आध्यात्मिक भी है, ऐतिहासिक भी, और सांस्कृतिक भी.
इन मंदिरों में नाम आता है विश्वनाथ मंदिर, दुर्गा कुंड के दुर्गा मंदिर, मानस मंदिर और संकट मोचन मंदिर का.
इनमें विश्वनाथ मंदिर के आस-पास विशेष सुरक्षा रहती है क्योंकि विश्वनाथ मंदिर के ठीक सटे हुए एक मस्जिद है और वहाँ की स्थिति को अयोध्या के राममंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद की तरह देखा जाता है.
दशाश्वमेध घाट के पास स्थित विश्वनाथ मंदिर परिसर में चप्पे-चप्पे पर हथियारबंद सुरक्षाकर्मी होते हैं और मंदिर पहुँचने से काफ़ी पहले ही लोगों की मेटल डिटेक्टर से गुज़रना होता है और उनको अपने सामान की भी जाँच करवानी होती है.
विश्वनाथ मंदिर में पंडे होते हैं जो भक्तों को अपनी ओर बुलाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाए होते हैं और साथ ही गलियों के बीच से होकर गुजरते मंदिर में प्रायः काफ़ी भीड़ रहती है.
लेकिन संकट मोचन मंदिर में स्थिति इससे ठीक उलट होती है, वहाँ उस क़दर भीड़ नहीं हुआ करती, ना संकरी गली है, ना पंडे और ना सुरक्षा का वैसा ताम-झाम.
संकट मोचन मंदिर
संकट मोचन मंदिर एक ऐतिहासिक मंदिर है और इसमें रखी भगवान हनुमान की मूर्ति को बाबा संकटमोचन कहा जाता है और मंदिर को संकटमोचन मंदिर.
मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि इसे कवि गोस्वामी तुलसीदास ने स्वयं अपने हाथों से गढ़ा था और तब एक छोटा-सा मंदिर बाद में विस्तृत होता गया.
ऐसी भी मान्यता है कि 16वीं शताब्दी में तुलसीदास ने पवित्र हिंदू ग्रंथ रामचरितमानस् का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा वहीं रहकर लिखा था.
मंदिर वाराणसी के दुर्गाकुंड क्षेत्र में स्थित है जो प्रख्यात काशी हिंदू विश्ववविद्यालय के काफ़ी निकट है.
अक्सर वहाँ विश्वविद्यालय के कई छात्रों और कई शिक्षकों को एक साथ आराधना करते देखा जा सकता है.
मंदिर के महंत वीरभद्र मिश्र काशी हिंदू विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग विभाग में प्राध्यापक रह चुके हैं.
सांस्कृतिक समारोह
वर्तमान समय में मंदिर आध्यात्म के अतिरिक्त सांस्कृतिक समारोहों के लिए भी जाना जाता है.
हर वर्ष मंदिर के प्रांगण में संकट मोचन संगीत समारोह होता है.
समारोह में भारत भर के चोटी के शास्त्रीय गायक-वादक और नर्तक हिस्सा लेते हैं.
इस समारोह के माध्यम से आम लोगों को भी बिना किसी शुल्क के उन नामी कलाकारों की कला को समझने का मौक़ा मिलता है जो अक्सर बड़े संगीत कार्यक्रमों में ही दिखाई देते हैं और वहाँ भी प्रवेश महँगे टिकटों से ही मिल पाता है.