शनिवार, 04 मार्च, 2006 को 10:01 GMT तक के समाचार
फ़रवरी 2002 में गुजरात के गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रैस में लगी आग की जाँच करने वाली न्यायमूर्ति यूसी बैनर्जी समिति ने अंतिम रिपोर्ट में भी दोहराया है कि आग बाहर से नहीं लगाई गई थी और वो एक दुर्घटना थी.
केंद्र की यूपीए सरकार ने सितंबर 2004 में गोधरा कांड की जाँच के लिए यूसी बैनर्जी समिति का गठन किया था और इस समिति ने जनवरी 2005 में अपनी अंतरिम रिपोर्ट में भी कहा था कि रेलगाड़ी में लगी आग एक दुर्घटना थी.
न्यायमूर्ति बैनर्जी ने अपनी अंतिम रिपोर्ट शुक्रवार को रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष जयप्रकाश बत्रा को सौंप दी.
ग़ौरतलब है कि फ़रवरी 2002 में गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन में साबरमती एक्सप्रेस की एक बोगी में आग लगने से 58 हिंदुओं की मौत हो गई थी.
इसके बाद पूरे गुजरात में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे जिनमें गुजरात सरकार के आँकड़ों के अनुसार एक हज़ार से ज़्यादा मुसलमानों की मौत हो गई थी. हालाँकि ग़ैरसरकारी संगठन मृतकों की संख्या दो हज़ार से ज़्यादा बताते हैं.
इससे पहले केंद्र की यूपीए सरकार की एक और समिति ने इससे इनकार किया था कि गोधरा में ट्रेन में आग किसी षडयंत्र के तहत लगाई गई थी.
न्यायमूर्ति एससी जैन के नेतृत्व वाली इस तीन सदस्यीय समिति के पास गुजरात में गोधरा से जुड़े पोटा के मामलों की जाँच करने की ज़िम्मेदारी थी.
वैसे गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों की जाँच नानावती आयोग कर रहा है.
रिपोर्ट
तीन खंडों की अंतिम रिपोर्ट रेलवे बोर्ड को सौंपते हुए न्यायमूर्ति बैनर्जी ने कहा, "अंतरिम रिपोर्ट सौंपने के बाद मैंने कई और साक्ष्यों की जाँच की और मुझे ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिसके कारण मैं अंतरिम रिपोर्ट के नतीजों को बदलूँ."
उन्होंने कहा कि वह इस बात से आश्वस्त हैं कि आग बाहर से नहीं लगाई गई थी और ये भीतर से ही लगी थी.
उन्होंने इन आरोपों का भी खंडन किया कि साबरमती एक्सप्रेस की उस बोगी के दरवाज़े बाहर से बंद कर दिए गए थे.
उन्होंने कहा, "अगर कोई जाकर रेल के डिब्बों को देखे तो पता चल जाएगा कि इसे बाहर से बंद नहीं किया जा सकता बशर्ते रेलवे के कर्मचारी ख़ुद इसे बंद करे."
न्यायमूर्ति बैनर्जी ने पूछा कि उस समय डिब्बे में दो सौ से ढाई सौ लोग थे और ये कैसे संभव हो सकता है कि दो सौ लोग बाहर आ जाएँ.
उन्होंने एक भुक्तभोगी का अनुभव बताते हुए कहा कि धुँआ ज़्यादा था और इसी के कारण ज़्यादा लोगों की मौत हुई होगी.
गुजरात पुलिस पर आरोप
इस सवाल पर कि क्या गुजरात पुलिस के अधिकारियों ने उन्हें पूरा सहयोग दिया, उन्होंने कहा कि गुजरात पुलिस के अधिकारियों ने लंबे समय तक उनसे मुलाक़ात ही नहीं की.
गुजरात के तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (इंटेलिजेंस) शिवकुमार, पुलिस अधीक्षक राजू भार्गव और एक अन्य पुलिस अधिकारी जेके भट्ट का नाम लेकर उन्होंने कहा कि तीनों अधिकारी सवा साल तक जाँच समिति के सामने उपस्थित ही नहीं हुए.
न्यायमूर्ति बैनर्जी ने कहा कि जब तक समिति को आयोग जैसे अधिकार नहीं दिए गए तब तक उनके बयान नहीं लिए जा सके.
इन पुलिस अधिकारियों के बयान के आधार पर भी न्यायमूर्ति बैनर्जी ने कहा कि जब ट्रेन में आग लगी तब स्टेशन के पास दंगाई नहीं थे, सिर्फ़ तमाशबीन थे जिनमें महिलाएँ और बच्चे थे.
रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष ने कहा है कि वह इस रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद कोई फ़ैसला करेंगे.