रेणु अगाल
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत और अमरीका के बीच असैनिक परमाणु समझौते के साथ ही रिश्तों ने एक ऐतिहासिक मोड़ ले लिया है.
दुनिया के दो बड़े लोकतंत्रों के बीच असैनिक परमाणु सहयोग दोनों देशों के लिए मील का पत्थर साबित होगा.
भारत तीन दशकों बाद प्रतिबंधों के बोझ से दूर होगा. यहाँ के वैज्ञानिक परमाणु तकनीक विकसित करने के लिए दुनिया के दूसरे वैज्ञानिकों के साथ विचार मंथन कर पाएंगे.
भारत के लिए आठ से 10 प्रतिशत विकास दर को चलाने के लिए अपनी ऊर्जा ज़रूरतों का एक बड़ा हिस्सा परमाणु ऊर्जा से मिल पाएगा.
भारत शायद ऐसा अकेला देश है जिसने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए बग़ैर अमरीका से ये बराबरी का समझौता किया है.
महत्वपूर्ण बात यहाँ ये है कि इस समझौते ने भारत और अमरीका को विकास में बराबर का सहयोगी बनाया है.
ये भी ऐसे वक़्त हुआ है जब काँग्रेस की सरकार सत्ता में है. पंडित जवाहरलाल नेहरू की गुट निर्पेक्ष नीति को आख़िरकार एक काँग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने ही दफ़न कर दिया है और शायद एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था और इसमें अमरीका के साथ के महत्त्व को स्वीकार कर लिया.
यह ऐतिहासिक इसलिए भी है कि सरकार को अमरीका विरोधी वाम दल समर्थन दे रहे हैं.
उधर अमरीकी नज़र से देखें तो अमरीका के लिए पाकिस्तान उसका ‘नेचुरल एलाई’ यानी स्वाभाविक मित्र है और भारत से उसका रिश्ता पाकिस्तान के आइने से जोड़कर ही देखा जाता था, पर अब ऐसा नहीं कहा जा सकता.
पाकिस्तान भले ही 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध' में अमरीका का निकट सहयोगी है लेकिन अमरीका मानता है कि आने वाला समय भारत का है.
अमरीका की चीन के साथ रिश्ते सुधारने की जैसी तत्परता थी वैसी ही अब भारत से है.
बिल क्लिंटन और बुश के बाद अब आने वाले अमरीकी राष्ट्रपति अपने कार्यकाल में भारत ज़रूर आएंगे.
आज से 20 साल बाद भारत महाशक्ति के रूप में उभर सकता है. इसकी आबादी युवा होगी जबकि कम जनसंख्या दर की वजह से चीन बूढ़ा हो जाएगा, फिर भारत में लोकतंत्र भी है.
ऐसे हालात में इतिहास के बोझ को फेंककर दोनों देश नए प्रगाढ़ रिश्तों में अपना उजला भविष्य ढूंढ रहे हैं.