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मंगलवार, 28 फ़रवरी, 2006 को 19:06 GMT तक के समाचार

मुकेश शर्मा
बीबीसी हिंदी संवाददाता

'मध्यस्थता' की संवेदनशीलता समझी है अमरीका ने

शीत युद्ध के काल ने जहाँ भारत को तत्कालीन सोवियत संघ और पाकिस्तान को अमरीका के पाले में चिह्नित कर रखा था वहीं कश्मीर मसले पर उसकी मध्यस्थता की मंशा भी विवाद का रूप लेती रही थी.

बदले समय और परिस्थितियों में अब अमरीका ने उस मंशा को दरकिनार कर दिया है.

कश्मीर मसले पर मध्यस्थता से जुड़े रुख़ में ये बदलाव स्पष्ट होने शुरू हुए पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के प्रशासन के अंतिम वर्षों से क्योंकि क्लिंटन प्रशासन के शुरुआती वर्षों में भारत में हुए परमाणु परीक्षणों ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को और हवा दी थी.

पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रहे जी पार्थसारथी कहते हैं कि अब बुश प्रशासन ये पहचान चुका है कि अगर उनके आपसी हित एक दूसरे से मिलें तो भारत क्षेत्रीय सहयोग के लिए उनका अच्छा सहयोगी बन सकता है.

संवेनशील है मध्यस्थता

पिछले दिनों अमरीका में एशिया सोसाइटी में दिए भाषण में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा कि वह भारत और पाकिस्तान की आगामी यात्रा में दोनों ही देशों को प्रोत्साहित करेंगे कश्मीर मसले का हल ढूँढ़ने के लिए.

कश्मीर का मसला भारत के लिए इतना संवेदनशील रहा है कि उनके इस बयान पर भी भारत में त्यौरियाँ चढ़ीं.

अमरीका पर साम्राज्यवादी नीतियाँ अपनाने का आरोप लगाने वाले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सभा में नेता नीलोत्पल बसु उस टिप्पणी को भारत की घोषित नीति का उल्लंघन मानते हैं.

नीलोत्पल बसु के अनुसार, “ये बयान दोनों देशों के बीच एक घटक की भूमिका निभाने की उनकी कोशिश दिखती है.”

वहीं पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव नियाज़ नाइक के अनुसार अमरीका तो भारत और पाकिस्तान के बीच सुलह चाहता है, और इसी के लिए उन्हें प्रोत्साहित करता है.

वह मानते हैं कि दोनों देशों के बीच शांति अमरीका के क्षेत्रीय हित में भी है क्योंकि अमरीका इसके ज़रिए मध्य एशिया, पूर्वी एशिया और आस पड़ोस के अन्य अशांत क्षेत्रों में इन देशों की मदद ले सकता है.

क्या है सच्चाई

मगर इस प्रोत्साहन के बीच चाहे वो करगिल संघर्ष के दौरान अमरीका का हस्तक्षेप रहा हो या भारतीय संसद पर 13 दिसंबर 2001 को हुए हमले के बाद बने तनाव को दूर करने की अमरीकी कोशिश.

उन घटनाक्रमों को देखकर सवाल उठता है कि क्या ऐसे प्रयास कूटनीति के अनुसार मध्यस्थता की परिभाषा में नहीं आते?

इस बारे में अमरीका के जॉर्जिया विश्वविद्यालय में एशिया कार्यक्रम के निदेशक और दक्षिण एशिया के मामलों में बुश प्रशासन के सलाहकार डॉक्टर अनुपम श्रीवास्तव कहते हैं कि चाहे वो करगिल के दौरान पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को अमरीका बुलाकर दी गई धमकी का मामला हो या इससे पहले भी एक-दो बार परमाणु मसलों पर बढ़ते तनाव को देखते हुए दोनों देशों के मतभेद सुलझाने की कोशिश, अमरीका हस्तक्षेप करता है.

डॉक्टर श्रीवास्तव के अनुसार, “इस तरह की मध्यस्थता के बाद अमरीका कोशिश यही करता है कि तुरंत वह पीछे हट जाए जिससे दोनों ही देशों के राजनीतिक नेतृत्व को ये दिखाने का मौक़ा मिल जाए कि हम अपना संकट ख़ुद ही हल करने की कोशिश कर रहे हैं न कि अमरीकी दबाव में.”

अमरीका का अब घोषित रुख़ है कि वो भारत और पाकिस्तान के बीच एक ‘फ़ैसिलिटेटर’ बनना चाहता है यानी उनके बीच शांति प्रयास को आसान बनाने वाला रहना चाहता है.

मगर भारत के पूर्व विदेश मंत्री यशवन्त सिन्हा इस शब्द के इस्तेमाल पर भी ऐतराज़ रखते हैं.

वह कहते हैं, “तबीयत ठीक न होने पर हालचाल पूछने का तो अधिकार एक मित्र को है मगर अगर वह डॉक्टर नहीं हो तो वह दवा न बताए.”

यशवन्त सिन्हा के अनुसार, "अमरीका अगर इस तरह से भारत-पाकिस्तान से संबंधों के बारे में सिर्फ़ जानकारी हासिल करना चाहता है तब जैसे दूसरे देशों को हम जानकारी देते हैं, उन्हें भी दे सकते हैं मगर उसके आगे किसी भी तीसरे देश की कोई भूमिका नहीं हो सकती."

आतंकवाद का मसला

भारत और पाकिस्तान के रिश्तों की चर्चा में हमेशा से ही बात उठती रही है आतंकवाद की भी.

भारत जिस तरह बार-बार पाकिस्तान पर इस बारे में आरोप लगाता रहा है, उसके बाद भारत में विपक्षी दलों की माँग है कि राष्ट्रपति बुश की इस यात्रा में इस मसले पर भी चर्चा हो.

डॉक्टर अनुपम श्रीवास्तव का इस बारे में कहना है कि अमरीका प्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान की कोई बड़ी आलोचना नहीं करेगा क्योंकि इससे राष्ट्रपति मुशर्रफ़ पर दबाव और बढ़ेगा.

आलोचना करने पर अमरीका को मध्य एशिया और अफ़ग़ानिस्तान में जैसी मदद चाहिए वो भी पाकिस्तान से मिलनी मुश्किल हो जाएगी.

उनके अनुसार पाकिस्तान के साथ ऐसे दायरे में संबंध रखे गए हैं जहाँ वो एक दोस्त भी है और वहाँ पनप रहा आतंकवाद एक चिंता का विषय भी.