मंगलवार, 28 फ़रवरी, 2006 को 04:15 GMT तक के समाचार
रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक पीठ ने दो के मुक़ाबले एक के बहुमत से आए फ़ैसले से बहुजन समाज पार्टी के 40 विधायकों के दलबदल का मामला एक बार फिर विधानसभा अध्यक्ष के पास पहुँच गया है.
पीठ ने बहुजन समाजवादी पार्टी में विभाजन और उनके समाजवादी पार्टी में शामिल होने के पुराने फ़ैसले को ग़लत बताते हुए कहा है कि इस मामले पर विधानसभा अध्यक्ष को फिर सुनवाई करना चाहिए.
मंगलवार को हाई कोर्ट के पीठ के इस महत्वपूर्ण फ़ैसले से राजनीतिक सरगर्मियाँ तेज़ हो गई हैं.
भाजपा ने मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से इस्तीफ़ा माँगते हुए विधानसभा भंग करने की माँग की है वहीं कांग्रेस ने भी मुलायम सिंह का इस्तीफ़ा माँगा है.
वहीं समाजवादी पार्टी ने कहा है कि इससे सरकार को कोई ख़तरा नहीं है क्योंकि उनके पास बहुमत है और वे फ़ैसले के बाद संभावित विकल्पों पर विचार कर रहे हैं.
उधर बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने नए चुनाव करवाए जाने की मांग करते हुए कहा है कि मुलायम सिंह को बहुमत साबित करने का नाटक करने की जगह इस्तीफ़ा देकर राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए.
फ़ैसला
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एएम रे, न्यायमूर्ति जगदीश भल्ला और न्यायमूर्ति प्रदीप कांत के तीन सदस्यीय पीठ ने यह फ़ैसला एक के मुक़ाबले दो के बहुमत से आया है.
मुख्य न्यायाधीश एएम रे ने अपने फ़ैसले में बसपा की याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि विधानसभा अध्यक्ष का फ़ैसला सही था.
लेकिन बाक़ी दो न्यायाधीशों ने इसके एकदम उलट ख़बर देते हुए कहा है कि बसपा में टूट को मान्यता देना ग़लत था और इस पर विधानसभा अध्यक्ष को एक बार फिर विचार करना चाहिए.
एक के मुक़ाबले दो के बहुमत से आए इस फ़ैसले में कहा गया है कि विधानसभा अध्यक्ष को एक बार फिर दोनों दलों को मौक़ा देते हुए फिर सुनवाई करना चाहिए.
मामला
उल्लेखनीय है कि 23 अगस्त, 2003 को बसपा के 13 विधायक पार्टी से अलग हो गए थे जिसके बाद मुलायम सिंह सरकार का गठन हो पाया था.
इसके बाद बसपा से 27 और विधायक टूट गए और इन 40 विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष से अलग गुट के रूप में मान्यता देने का अनुरोध किया. बाद में ये सभी विधायक समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे.
तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी ने बसपा विधायकों को अलग दल के रूप में मान्यता दे दी थी.
बसपा ने इस फ़ैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी और पहले अलग हुए 13 विधायकों की सदस्यता समाप्त करने का अनुरोध किया.
यदि बसपा सदस्यों की सदस्यता समाप्त हो गई तो मुलायम सिंह सरकार अल्पमत में आ सकती है और उन्हें सदन में बहुमत साबित करना पड़ सकता है.
विधानसभा की स्थिति
उत्तर प्रदेश विधानसभा में 402 सदस्य हैं और यदि 40 सदस्यों की सदस्यता समाप्त हो गई तो सदन के समाजवादी पार्टी के सदस्यों की संख्या 154 रह जाएगी. अभी यह संख्या 194 है.
समाजवादी पार्टी के नेताओं का कहना है कि उनके पास पर्याप्त बहुमत है और सरकार को कोई ख़तरा नहीं है.
हालांकि सदस्यों के कम हो जाने के बावजूद मुलायम सिंह को निर्दलीय और कई छोटी पार्टियों के 191 विधायकों का समर्थन हासिल होगा.
लेकिन लोगों की निगाहें अजित सिंह की राष्ट्रीय लोक दल पर टिकी हैं जिसके 15 विधायक है और जो मुलायम सिंह सरकार में शामिल हैं.
उनके समर्थन वापसी के किसी भी फ़ैसले से मुलायम सरकार मुश्किल में पड़ सकती है.
सदन में बसपा के 67, भाजपा के 83, कांग्रेस के 16 और सीपीआई के दो विधायक हैं.