बेस्ट बेकरी मामले को फिर से अदालत तक पहुँचाने वाली और इस मामले से शुरू से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ मानती है कि बेस्ट बेकरी मामले पर न्यायालय के फ़ैसले से आम लोगों में कानून व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ा है.
उन्होंने कहा कि गवाहों के पलट जाने पर न्यायालय ने जो गंभीर रुख़ अपनाया है वह सबसे अहम है.
बीबीसी संवाददाता शुभोजीत बागची ने न्यायालाय का फ़ैसला आने के बाद उनसे बातचीत की.
पेश हैं कुछ प्रमुख अंश-
इस फ़ैसले को आप किस तरह से देखती हैं?
मैं इससे काफ़ी संतुष्ट हूँ क्योंकि इसमें न्यायपालिका का काफ़ी योगदान रहा है और न्यायपालिका की पूरी कोशिश रही है कि यह मामला फिर से खुले और इसकी दोबारा सुनवाई हो. इस मामले को गुजरात से बाहर भेजा गया.
और तो और, सबसे अहम तो यह है कि गवाहों के मुकर जाने के मसले को इस बार न्यायपालिका ने काफ़ी गंभीरता से लिया है.
इस फ़ैसले के बाद आम आदमी का न्यायपालिका और कानून व्यवस्था में विश्वास और मज़बूत हुआ है.
इस फ़ैसले में घटना की चश्मदीद गवाह ज़ाहिरा शेख को भी नोटिस जारी किया गया है. इस बारे में आपका क्या कहना है?
ज़ाहिरा शेख ने मुझपर कई गंभीर आरोप लगाए थे जो कि पूरी तरह से निराधार थे. इस बारे में मुझे लगता है कि कुछ कार्यवाही तो होनी ही चाहिए.
हाँ, मगर दूसरी ओर मुझे व्यक्तिगत स्तर पर काफ़ी अफ़सोस है कि यदि वह सच बोलती तो शायद आज उसे यह न देखना पड़ता. उसने अपने लिए एक बेहतर अवसर खोया है.
अब इस मामले का भविष्य आप किस तरह से देखती हैं?
अब यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा. अभी तो सत्र न्यायालय में ही सुनवाई हुई है और फ़ैसला आया है.
दूसरे पक्ष के पास केवल अपील का ही विकल्प बचा है और यदि वह अपील करते हैं तो हम भी मामले को आगे लेकर जाएंगे.
इस सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण तो यह है कि गुजरात की राज्य सरकार इस मामले में और सन् 2002 के दंगापीड़ितों के साथ न्याय करने की दिशा में आगे क्या क़दम उठाती है.
गुजरात के एक भाजपा सांसद ने कहा है कि इससे राज्य सरकार का निष्पक्ष रुख़ स्पष्ट हो गया है और वह न्यायालय के फ़ैसले से ख़ुश हैं. आपकी इस बारे में क्या प्रतिक्रिया है?
यह तो पूरी तरह से झूठ है क्योंकि अगर इस मामले की सुनवाई अगर गुजरात में ही होती तो तस्वीर शायद कुछ और होती.
यहाँ तक की मुंबई में भी जिन लोगों ने इस मामले को प्रभावित करने की कोशिश की, ऐसा नहीं है कि उनका गुजरात सरकार से कोई ताल्लुक नहीं था. गुजरात सरकार ने ज़ाहिरा शेख को उसका बयान बदल देने के बाद ही सुरक्षा दी. बाकी के गवाहों को किसी तरह की कोई सुरक्षा मुहैया नहीं कराई गई.