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शुक्रवार, 24 फ़रवरी, 2006 को 10:33 GMT तक के समाचार

अशोक भटनागर
रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष

रेल बजट: थोड़ा पीछे, थोड़ा आगे

ये रेल बजट नई अर्थव्यवस्था से तालमेल बिठाने में पीछे है. रेलवे की व्यवस्था में भारी सुधार की ज़रूरत है क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था का तेज़ी से विस्तार हो रहा है.

बजट में कई अच्छी बातें भी हैं. मालभाड़े से आय और कुल आय में वृद्धि हो रही है.

यह वृद्धि देश की अर्थव्यवस्था से मुक़ाबला करती है. इससे क्षमता बढ़ाने की समस्या भी खड़ी हो गई है. दसवीं योजना का लक्ष्य पहले ही पूरा कर लिया गया है.

यही वजह है कि इस रेल बजट में लंबी ट्रेनों को चलाने और प्लेटफार्म को बढ़ाने जैसी पुरानी योजनाओं को फिर से शुरू किया गया है.

यात्रियों के लिए यह अच्छी ख़बर है कि राजधानी एक्सप्रेस की तरह पूरी वातानुकूलित ट्रेनें चलाई जाएँगी. साथ ही तेज़ गति की ट्रेनों की भी संख्या बढ़ाई जा रही है.

बजट की कमियाँ

मेरे विचार में बजट में कई कमियाँ भी हैं. इसमें यदि धीमी गतिवाली ट्रेनों की ओर विशेष ध्यान दिया जाता तो बेहतर होता.

इससे एक तो यात्री अपने गंतव्य पर जल्द पहुँच पाते. दूसरे नई ट्रेनें भी चलाई जा सकतीं.

नई अर्थव्यवस्था में माल ढुलाई के लिए एक नई संस्था बनाए जाने की ज़रूरत थी जो छोटे कारोबारियों का ध्यान रखती.

रेलवे का कंटेनर कॉरपोरेशन केवल आयातकों और निर्यातकों का ही ध्यान रखता है.

एसी के किराए घटाए जाने की कोई ज़रूरत नहीं थी. इससे प्रति यात्री घाटा बढ़ेगा.

जहाँ तक सस्ती एयरलाइंस से मुक़ाबले की बात है तो उनसे मैं रेल की कोई प्रतिस्पर्धा नहीं मानता.

रेल की सेवा व्यापक है जबकि सस्ती एयरलाइंस की सेवा बहुत सीमित है.

(आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित)