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मंगलवार, 21 फ़रवरी, 2006 को 07:51 GMT तक के समाचार

विनोद वर्मा
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

भारत की प्राचीनतम नाट्यशाला पर विवाद

छत्तीसगढ़ में भारत की प्राचीनतम नाट्यशाला होने का दावा किया जाता है.

कभी मिथकों से जोड़कर तो कभी वहाँ मिले शिलालेख के आधार पर पुरातत्वशास्त्री और इतिहासकार इसे नाट्यशाला मानते रहे हैं.

लेकिन विद्वानों का एक वर्ग ऐसा भी है जो इसे नाट्यशाला मानने से इंकार करता है और इस दावे की जाँच की माँग करता है.

प्राचीनतम नाट्यशाला

लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य इसे प्राचीनतम नाट्यशाला के रुप में ही प्रचारित करता है और यह राष्ट्रीय धरोहरों की सूची में भी शामिल है.

सीताबेंगरा

सरगुजा ज़िले के मुख्यालय अंबिकापुर से 50 किलोमीटर दूर रामगढ़ की पहाड़ियाँ हैं. इन्ही पहाड़ियों में कुछ गुफ़ाएँ हैं.

इनमें दो मुख्य गुफ़ाएँ हैं और इन्हीं में से एक गुफ़ा को नाट्यशाला माना जाता है. वैसे वहाँ और कुछ छोटी गुफ़ाएँ भी हैं.

मिथकों के आधार पर कहा जाता है कि यहीं राम, सीता और लक्ष्मण ने अपने वनवास काल का कुछ समय यहीं बिताया था.

इसी मिथक कथा से जोड़कर मुख्यगुफ़ा को सीताबेंगरा कहा जाता है. जिसका अर्थ होता है सीता की गुफ़ा. दूसरी छोटी गुफ़ा को जोगीमढ़ा कहा जाता है.

वैसे तो ये गुफ़ाएँ प्राकृतिक हैं लेकिन मनुष्यों ने अपनी अभिरुचि से इसे उपयोग के लायक बना लिया है. इससे गुफ़ा के भीतर एक कमरा और उसमें बैठने के लिए चबूतरा बन गया है.

कुल मिलाकर यह गुफ़ा साढ़े 44 फ़ुट लंबी और छह फ़ुट चौड़ी है. इसी का एक हिस्सा नाट्यशाला का मंच माना जाता है.

इसके सामने, कुछ नीचे एक अर्धचंद्राकार निर्माण है जिसे दर्शक दीर्घा माना जाता है और यहाँ पचास के लगभग दर्शकों की जगह है.

आलेख

इन गुफ़ाओं के पास ब्राह्मी लिपि में कुछ लेख मिले हैं और इन्ही लेखों के आधार पर दवा किया जाता है कि ये नाट्यशाला रही होगी.

हालांकि इन लेखों का कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया है लेकिन जितना हिस्सा बचा है उसे पढ़कर प्रतीत होता है कि इस जगह का संबंध अवश्य ही किसी प्रदर्शन कला से रहा होगा.

लेकिन इस तर्क से कई लोग सहमत नहीं होते. सरगुजा पर 1930 में प्रकाशित पुस्तक ‘झारखंड झंकार’ में लेखक रघुवीर प्रसाद ने भी लिखा है कि इस आलेख के अनुवाद को लेकर नए-नए विवाद खड़े होते रहे हैं.

इसे नाट्यशाला न मानने वालों का तर्क है कि इसकी छत बहुत नीची है जिसे देखकर लगता नहीं कि छह फ़ुट की छत वाले स्थान पर कोई नाट्य गतिविधि संभव हो सकती है.

लेकिन जो इसके नाट्यशाला होने से सहमत हैं उनका कहना है कि जिस समय यह बना होगा उस समय की नाट्य प्रवृत्तियाँ कैसी थीं इसका अध्ययन भी किया जाना चाहिए.

पुरातत्वविद मानते हैं कि इसका निर्माण तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में किया गया होगा.

इसकी खोज कर्नल आउस्ले नाम के एक अंग्रेज़ ने 1848 में की थी और इस खोज के लगभग सवा सौ साल बाद कुछ इतिहासकारों ने स्थानीय प्रशासन की मदद से इसे प्राचीनतम नाट्यशाला घोषित किया.

जैसा कि वहाँ लगा पत्थर बताता है, तब इसे कालीदास के मेघदूत से भी जोड़कर देखा गया.

विवाद

इसी घोषणा पर कुछ लोगों को आपत्ति है.

बिलासपुर के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार सतीश जायसवाल का कहना है, “वो नाट्यशाला हो ही नहीं सकती क्योंकि ये दो बुनियादी शर्तों को पूरा नहीं करती. एक तो वहाँ नाट्य गतिविधियों की जगह नहीं दिखती और दूसरे वहाँ दर्शकों के बैठने की समुचित व्यवस्था नहीं दिखती.”

उनका मानना है कि जहाँ गुफ़ाएँ हैं वहाँ आवाज़ अच्छी तरह गूँजती है और शायद इसी को आधार बनाकर कुछ लोगों ने ‘कपोलकल्पना’ कर ली.

सतीश जायसवाल कहते हैं, “कुछ लालबुझक्कड़ जैसे लोगों ने अपने आप तय कर लिया कि ये नाट्यशाला है. वे न विशेषज्ञ थे न उनको ऐसा करने का कोई अधिकार था लेकिन उन्होंने घोषणा कर दी.”

वे मानते हैं कि इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने के लिए आवश्यक प्रमाण एकत्रित करने की औपचारिकता भी पूरी नहीं की गई.

लेकिन पुरातत्वविद डॉ लक्ष्मीशंकर निगम से लेकर शोधकर्ता निरंजन महावर तक कई लोग दावे के साथ कहते हैं कि वो नाट्यशाला तो यक़ीनन है.

नाट्य विधाओं पर शोध कर पुस्तक लिख चुके निरंजन महावर कहते हैं, “इससे पहले कि इसमें नाटक खेले जाने की संभावनाओं पर सवाल खड़े किए जाएँ, उस समय की नाट्य विधाओं का अध्ययन कर लेना अच्छा होगा.”

वे नाट्यशाला को लेकर हो रहे विवाद को वे अनावश्यक मानते हैं.

बहरहाल आमलोगों के लिए वह भारत की प्राचीनतम नाट्यशाला ही है और वे इस विवाद में पड़े बिना इस पर यक़ीन करते हैं. शायद इसलिए भी कि इसका नाम राम और सीता से जुड़ा है.

ठीक भी है, जब आस्था जुड़ी हो तो तर्क काम नहीं आते.