मंगलवार, 21 फ़रवरी, 2006 को 17:49 GMT तक के समाचार
सीमा चिश्ती
संपादक, बीबीसी हिंदी-दिल्ली
पिछले कुछ दिनों से पैग़ंबर मोहम्मद के कार्टून छापने का मसला कहीं सांप्रदायिक रंग तो कहीं राजनीतिक रंग लेता नज़र आ रहा है.
सोचा आम आदमी के इस बारे में क्या ख़याल हैं, इसकी टोह ली जाए और ऐसा सोचकर हम पुरानी दिल्ली के जामा मस्ज़िद से लगे गली-मोहल्लों में जा पहुँचे.
वैसे फ़रवरी की दोपहर में पुरानी दिल्ली की गलियों में किसी को आपसे बात करने की फुरसत नहीं होती, लेकिन फिर भी कुछ लोग, जैसे उर्दू बाज़ार में ज़ैदी साहब ने हमसे बात की.
ज़ैदी साहब कहते हैं, "इस तरह कार्टून छापने का विरोध बिल्कुल सही है और बल्कि इससे ज़्यादा ही होना चाहिए था. यह यहूदियों की साज़िश है और इसका मकसद आदम-ए-इस्लाम को तकलीफ़ पहुँचाना है."
अकसर राय कुछ ऐसी ही मिली.
सबीहा, एक शायरा हैं, और यहाँ एक मुशायरे के सिलसिले में आई हैं.
सबीहा कहती हैं, "क्या ज़रूरी है कि इस तरह के चित्र बनाए जाएं. कभी कृष्ण की तो कभी मोहम्मद साहब की. इससे दो कौमों के बीच आग तो भड़केगी ही."
हम आगे बढ़े तो उर्दू बाज़ार में एक नाई के रूप में काम कर रहे मोहम्मद दानिश से मुलाक़ात हो गई.
दानिश का मानना है कि सब्र करना समझदारी तो है, लेकिन कब तक.
यहाँ लोगों का मानना है कि अमरीका को मुसलमानों से ही समस्या है. और कार्टून तो सिर्फ़ एक बहाना है.
एक ऐसी ही धारणा रखने वाले व्यक्ति ने कहा, "यह तो जग जाहिर है कि अमरीका मुसलमानों का दुश्मन है और मुसलमानों के ख़िलाफ़ यह कोई न कोई साजिश तो करता ही रहता है."
एक प्रतिक्रिया तो ऐसी भी थी, "मामले को तूल तो मिल रहा है पर इससे एक बात तो साफ़ है कि यह वक्त-बेवक्त हमारे जज़्बातों से खेला जा रहा है."
गांधी का देश
बहरहाल, दुनिया में इन्डोनीशिया के बाद सबसे ज़्यादा मुसलमानों वाले देश भारत में अलग तरह की राय है, और प्रदर्शन का भी अन्दाज़ अलग रहा है.
जामा मस्जिद की अजान सुनाई दे रही थी और एक व्यक्ति हमें अपनी इच्छा समझा रहा था, "नहीं, कोई भी फसाद नहीं होना चाहिए. बैठकर और बातचीत के ज़रिए हल निकालना चाहिए. अमन-चैन को नुकसान पहुँचे, यह ठीक नहीं हैं और लोगों को सोचना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है."
अबरार हुसैन अनसारी होटल में सर्विस करते हैं. और नेताओं के प्रोत्साहन पर प्रदर्शन पर इनकी कुछ इस प्रकार की राय है.
"सब डकैत हैं. चाहे मुलायम सिंह हों या कि मायावती. नेता तो बस एक था और वह चला गया. वही जो लाठी लेकर चलता था. क्या नाम था उसका....हाँ, गांधी."
देश के नेताओं से लेकर दुनिया के तमाम मंचों की राय चाहे कुछ भी हो, दिल्ली के इस मुसलमान ने जो बात कही, शायद पूरी दुनिया के लिए इससे बड़ा उदाहरण और समाधान और कुछ भी नहीं हो सकता.