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शनिवार, 18 फ़रवरी, 2006 को 17:18 GMT तक के समाचार

रूपा झा
मुनाबाव से

चार दशक बाद जुड़े रिश्तों के तार

किसी रेल सेवा का शुरू होना क्या बड़ी बात है? फिर वो भारत और पाकिस्तान के बीच ही क्यों न हो? फिर ये कोई पहला संपर्क सूत्र तो था नहीं.

मगर मुनाबाव-खोखरापार रेल संपर्क शुरू होने पर जो देखा और महसूस किया उसने एक बार फिर याद दिलाया कि लोग उम्मीद से ख़ाली कभी नहीं होंगे.

17 तारीख की रात साढ़े ग्यारह बजे जोधपुर स्टेशन से थार एक्सप्रेस भारतीय यात्रियों को लेकर रवाना हुई और प्लेटफार्म तो ऐसे खचाखच भरा था, ऐसा माहौल था कि शायद उन पर विश्वास करने के लिए उन्हें देखना ज़रूरी हो.

थार एक्सप्रेस का सफ़र

हर चेहरा खुशी से दमकता हुआ, आँखें नम और जैसे पुराने एलबम की पुरानी तस्वीर देखते हुए पूरा बीता वक्त, जिया हुआ वक़्त फिर साँस लेने लगा हो.

मेरे लिए हर व्यक्ति के पास कहानी थी. राजस्थान और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के. शायद हर परिवार एक टूटा हुआ परिवार मिलेगा.

80 साल की नान्जी 18 साल बाद उमरकोट के अपने मायके जाने की बात से खुशी से पागल हुई जा रही थी. मैंने कहा अम्मा कुछ उमरकोट के गीत सुनाओ तो शुरू होते ही फूट-फूट कर रोने लगी.

पाकिस्तान की तरफ से आई थार एक्सप्रेस में शाहिदा बेगम 16 साल बाद अपने माँ-बाप से मिलने आ रही थीं.

जिस दूरी को तय करने में अब तक उन्हें लंबा सफर करना पड़ता था अब बस, रेल संपर्क से कुछ घंटों और कम रूपयों में हो पाएगा.

दुपट्टे से अपने आँखों को बार-बार पोंछती अपने छह बच्चों के साथ अपने मायके आगरा जल्दी-जल्दी पहुँचना चाहती हैं.

राजनीति की शब्दावली, राजनेताओं के आपसी दाँवपेंच, भारत पाकिस्तान की सीमाएँ.. ये सब बातें इन लोगों के लिए बेमानी हैं, इनकी तो एक ही तमन्ना है कि टूटे परिवारों और बीते कल से उनका रिश्ता फिर से जुड़े.