सुनील रामन
बीबीसी संवाददाता, बैंगलोर
बंगलौर के आईटी उद्योग और कॉल सेंटरों में पिछले कुछ दिनों से कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर बड़ा बदलाव दिख रहा है.
दिसंबर में एक कॉल सेंटर की महिला कर्मचारी की हत्या के बाद अचानक कर्मचारियों की सुरक्षा एक मुद्दा बन रहा है. हत्या उसको दफ़्तर ले जा रहे ड्राइवर ने की थी.
बंगलौर में करीब 500 कॉल सेंटर हैं जिनमें काम कर रहे ढाई लाख कर्मचारियों में से करीब 50 प्रतिशत महिलाएं हैं. देर रात की डयूटी के लिए उन्हें दफ़्तर जाना पड़ता है.
लेकिन दफ्तर ले जा रही गाड़ी असल में कंपनी की नहीं होती. इसे बाहर की ट्रांसपोर्ट कंपनियों से किराए पर लिया जाता है.
एक सुरक्षा जाँच एजेंसी के प्रबंधक श्रीधरन कहते हैं, "अब कंपनियों ने तय किया है कि इन ड्राइवरों की सुरक्षा जाँच की जाएगी. लेकिन बंगलौर पुलिस हर एक व्यक्ति की जाँच के लिए छह हज़ार रूपए लेती है. ज़ाहिर है कोई इतने पैसे खर्च नहीं करना चाहता."
कंप्यूटर कंपनी एचपी ने अपने कर्मचारी की हत्या के बाद एक हॉटलाइन फ़ोन लगाया है जिस पर फ़ोन कर कर्मचारी उसे घर से दफ्तर ले जा रहे वाहन की जानकारी ले सकता है. साथ ही वरिष्ठ प्रबंधकों के मोबाइल नम्बर अब इन कर्मचारियों को आपातकालीन स्थिति में इस्तेमाल करने के लिए दिए गए हैं.
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दिसंबर में हुई हत्या की घटना के बाद महिलाओं और उनके परिवारों में डर ज़रूर है.
लेकिन नौकरी छोड़ना इतना आसान नहीं. खासकर तब जब कॉल सेंटर की पहली तनख़्वाह दस हज़ार से अधिक होती है.
आईआईएक्स ग्लोबल नाम की एक कंपनी ‘पेपर स्प्रे’ बेचती है. इस स्प्रे में लाल मिर्च से बनाया एक मिश्रण है और अगर किसी व्यक्ति को हमले से अपनी सुरक्षा करनी हो तो वह इस स्प्रे को हमलावर के चेहरे पर छिड़कता है.
इस कंपनी के मालिक राणा सिंह का कहना है कि 500 रूपए के इस स्प्रे को बंगलौर में बेचना मुश्किल था जबकि पिछले तीन सालों में दिल्ली जैसे शहरों में ‘पेपर स्प्रे’ की बिक्री अच्छी थी.
राणा सिंह ने बताया कि अब स्थिति बदल गई है. वे बताते हैं, "अब लोग अपनी सुरक्षा के लिए इसे बंगलौर में भी खरीद रहे हैं. कॉल सेंटर हत्याकांड के पहले हम एक महीने में एक हज़ार स्प्रे के डब्बे बेचते थे लेकिन अब यह पाँच हज़ार हो गए हैं."
बंगलौर के ‘शॉपिंग मॉल’ में भी आधुनिक दवाखाने इसे सामने रखने लगे हैं. प्रभाकर के ‘हेलड और ग्लो’ के प्रबंधक ने कहा कि पहले वो स्प्रे को दुकान के किनारे में रखते थे. अब बढ़ती माँग के चलते उसे ऐसी जगह रखा है कि खरीददार उसे पूछे वगैर खरीद सकता है.
सुरक्षा विशेषज्ञ श्रीधरन कहते हैं कि कंपनियों पर हर कर्मचारी की सुरक्षा का बोझ नहीं डाला जा सकता. उनका मानना है कि हर व्यक्ति को अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी भी लेनी होगी.
सुरक्षित नहीं
बंगलौर अब सेवानिवृत्त लोगों का शहर नहीं रहा.
बढ़ते आईटी उद्योग के साथ-साथ एक बड़े शहर की समस्याएं भी बंगलौर में अब नज़र आती हैं. आस पास के क्षेत्रों के और दूसरे राज्यों से लोग अब यहाँ काम करने आते हैं.
महिला कर्मचारी कहती हैं कि बंगलौर अब पुराना बंगलौर जैसे नहीं रहा.
अब तक आम लोग परिवार और कंपनियों के मालिक बंगलौर में सुरक्षा के विषय पर गौर नहीं करते थे.
मगर दिसंबर के कॉल सेंटर हत्याकांड और भारतीय विज्ञान संस्थान में हुए आतंकवादी हमले के बाद कुछ हद तक लोगों का दृष्टिकोण बदल रहा है.