राहत संस्थाओं ने दिसंबर 2004 में सूनामी से प्रभावित पाँच देशों पर आरोप लगाया है कि वे सूनामी के शिकार हुए लोगों को घर, राहत सामग्री और काम उपलब्ध करवाने में नाकाम रहे हैं.
राहत संस्था 'एक्शन एड' और दो अन्य संस्थाओं ने इस मामले पर अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत, इंडोनेशिया, श्रीलंका, थाइलैंड और मॉलडीव्स में प्रभावित लोगों को सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारें मूक दर्शक बनी रहीं जब समुदायों को राहत पहुँचाने की जगह व्यवसायिक हितों को प्राथमिकता दी गई और ज़मीन हड़पी गई.
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और थाइलैंड में सामाज में वंचित जातियों और अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्यों को राहत के मामले में भेदभाव का सामना करना पड़ा.
भारत के संदर्भ में ये भी दावा किया गया है कि ग्रामीण अधिकारियों ने दलितों की मदद की गुहार को नज़रअंदाज़ किया.
इंडोनेशिया और मॉलडीव्स में तो महिलाओं का कहना था कि उन्हें बदतर हालत में घर उपलब्ध करवाए गए जहाँ रहना ख़तरे से खाली नहीं था.
एक्शन एड संस्था के कार्यकारी निदेशक रमेश सिंह ने पाँचों प्रभावित देशों पर दबे-कुचले वर्गों के अधिकारी की रक्षा करने में असफल रहने और राहत के लिए दान देने वालों कe भरोसा तोड़ने का आरोप लगाया है.
उधर इंडोनेशीय के आचे प्रांत में सूनामी के बाद पुनर्निर्माण के काम के अध्यक्ष ने राहत संस्थाओं की रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया है.
इंडोनेशिया के अधिकारी कुंतुरो मंगोकुसुब्रोतो ने बीबीसी से कहा कि वे आचे प्रांत में रहते हैं और जो मानवाधिकारों के हनन की बात रिपोर्ट में कही गई है वे उससे सहमत नहीं हैं.
उनका कहना था कि आचे में कई मुश्किलें हैं लेकिन महिलाओं के ख़िलाफ़ कोई भेदभाव नहीं है और किसी को भी उसकी ज़मीन से बेदख़ल नहीं किया गया है.
फ़िलहाल अन्य प्रभावित देशों में से इस रिपोर्ट पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.
ये रिपोर्ट सूनामी के शिकार हुए पाँच हज़ार लोगों के अनुभवों पर आधारित है.