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मंगलवार, 24 जनवरी, 2006 को 11:46 GMT तक के समाचार

देवदत्त
राजनीतिक विश्लेषक

राज्यपाल के पद का राजनीतिकरण

राज्यपाल के पद के राजनीतिकरण का इतिहास पुराना है और अब यह राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन गया है.

सत्तर के दशक से राज्यपाल के पद का राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है. बिहार के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से साफ़ है कि ये रुख़ अब भी क़ायम है.

ऐसा नहीं कि केवल कुछ दलों ने इसका इस्तेमाल किया. सभी दलों ने राज्यपाल के पद का राजनीतिकरण किया और उसका इस्तेमाल किया.

राज्यपाल के बाद अब यह बात आगे बढ़ गई है और स्पीकर व नौकरशाही के राजनीतिकरण का चलन चल गया है.

इसमें कोई शक नहीं कि राज्यपाल बूटा सिंह ने ग़लत जानकारी दी. लेकिन केंद्र सरकार को उस पर निर्णय लेने की इतनी जल्दी क्या थी.

लगभग 22 साल पहले सरकारिया आयोग ने सिफ़ारिश की थी कि राजनेताओं को राज्यपाल नहीं बनाना चाहिए. लेकिन आज तक उसकी सिफ़ारिशों पर अमल नहीं हुआ.

हाल में गोवा, झारखंड और बिहार जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं.

सुप्रीम कोर्ट की स्थिति

जहाँ तक सुप्रीम कोर्ट की स्थिति है तो वह केवल चेतावनी दे सकता है, टिप्पणी कर सकता है. लेकिन इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों को ही फ़ैसला करना होगा.

इन जैसी घटनाओं से क्षेत्रीय दलों में राष्ट्रीय दलों के प्रति अविश्वास बढ़ता है. पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार और केंद्र सरकार के बीच इसको लेकर खींचतान लंबे समय से चली आ रही है.

यही वजह है कि जम्मू कश्मीर की राज्य सरकारों के साथ खिलवाड़ भी चरमपंथ के बढ़ने की एक वजह मानी जाती है.

लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी राज्यपाल एक जैसे हों. जम्मू कश्मीर के राज्यपाल बीके नेहरू ने फ़ारूक़ सरकार को बर्ख़ास्त करने से इनकार कर दिया था लेकिन उन्हें अपने पद से जाना पड़ा था.

तमिलनाडु के राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला ने तमिलनाडु सरकार को बर्ख़ॉस्त करने से इनकार कर दिया था.

लेकिन बिहार के मामले ने इस बात की ज़रूरत पर एक बार फिर बल दिया है कि जो समान राष्ट्रीय समस्याएं हैं, उन पर सभी दल एक राय क़ायम करें. लोकतंत्रिक व्यवस्था की यह कमज़ोरी न बने बल्कि उसकी मज़बूती बने.

आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित