सोमवार, 23 जनवरी, 2006 को 13:52 GMT तक के समाचार
सुनील रामन
बीबीसी संवाददाता, बंगलौर
कर्नाटक के मुख्यमंत्री धरम सिंह को विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने के लिए केवल चार दिन बचे हैं लेकिन हैदराबाद में काँग्रेस नेताओं की चर्चाओं और बंगलौर में जनता दल-सेक्युलर के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा के बयानों से अब साफ़ होने लगा है कि शुक्रवार को कर्नाटक की पहली गठबंधन सरकार का संभवतः ख़ात्मा हो जाएगा.
जनता दल सेक्युलर के नेता एचडी देवेगौड़ा ने एक तरफ़ तो अपने पुत्र कुमारस्वामी के रुख़ का समर्थन किया है, दूसरी तरफ़ कांग्रेस की आलोचना भी की है.
देवेगौड़ा ने कहा, "मेरे बेटे ने जो कुछ भी किया है उससे पार्टी का फ़ायदा होगा, अन्यथा कांग्रेस हमारी पार्टी का बँटवारा कर देती."
देवेगौड़ा ने राज्य में कांग्रेस नेतृत्व की आलोचना करते हुए कहा है कि वह पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी से मुलाक़ात में यह मुद्दा उठाएंगे.
जनता दल-सेक्युलर के बाग़ी नेता और देवेगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी ने भारतीय जनता पार्टी से समझौता तोड़ने से साफ़ इनकार कर दिया है.
कुमारस्वामी बार-बार कह रहे हैं कि पिछले 20 महीनों में काँग्रेस ने उनके पिता देवेगौड़ा और उनकी पार्टी जनता दल-सेक्युलर का अपमान किया है.
कर्नाटक में 2004 के विधानसभा चुनाव के बाद किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था. हालाँकि 224 सदस्यों की विधानसभा में 79 विधायकों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी.
भाजपा से जनता दल-सेक्युलर ने सरकार बनाने के लिए हाथ मिलाने से इनकार कर दिया था.
नाराज़गी
भाजपा ने काँग्रेस को सत्ता में आने से रोकने के लिए जनता दल-सेक्युलर की सरकार का समर्थन तक करने का वायदा किया था लेकिन देवेगौड़ा ने उस निमंत्रण को यह कह कर नामंज़ूर कर दिया था कि वो केवल धर्मनिरपेक्ष ताक़तों का साथ देंगे, जिसके बाद काँग्रेस और जनता दल-सेक्युलर की संयुक्त सरकार बनी थी.
लेकिन कई वायदों के बाद भी आज तक काँग्रेस जेडी-एस के बीच समन्वय समिति का गठन नहीं हुई. जेडी-एस ने अपने प्रतिनिधियों की घोषणा तक कर दी थी लेकिन काँग्रेस के नेताओं के बीच आपसी मतभेद की वजह से इस समिति का गठन नहीं हो सका.
यही नहीं, राज्य के विभिन्न निगमों पर भी काँग्रेस ने अपना कब्ज़ा नहीं छोड़ा.
सत्ता में आने के बाद ज़ाहिर है कि जेडी-एस नेता निगम प्रमुख के पद अपने नेताओं को देना चाहते थे लेकिन काँग्रेस ने ऐसा नहीं होने दिया.
इन दो विषयों को लेकर काँग्रेस और जेडी-एस में लगातार विवाद रहा है और कुमारस्वामी ने पिछले 20 महीनों में अपनी नाराज़गी कभी छुपाई नहीं.
साथ ही राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के राज्यपाल एस एम कृष्णा द्वारा सरकार के कामकाज में कथित हस्तक्षेप से धरम सिंह ही नहीं बल्कि जेडी-एस नेता ख़ासे नाराज़ रहे हैं.
देवेगौड़ा ने अपनी नाराज़गी काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी तक पहुँचाई मगर कुछ नहीं बदला.
पिछले महीने हुए पंचायत चुनाव में जेडी-एस की पराजय ने काँग्रेस के एक बड़े तबके को देवेगौड़ा के ख़िलाफ़ अभियान शुरू करने को प्रोत्साहित किया.
जेडी-एस से निष्कासित नेता सिद्धारम्मैया के साथ मिलकर मध्यावधि चुनाव करने की बात पर चर्चा शुरू हुई.
दबाव
इस घटनाक्रम से देवेगौड़ा नाराज़ ज़रूर हुए लेकिन पंचायत चुनाव में हार के बाद उन्हें इस बात का अहसास हो गया कि काँग्रेस उनकी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाना चाहती है. देवेगौड़ा काँग्रेस पर केवल दबाव डालते रहे हैं.
कुमारस्वामी ने पार्टी नेताओं के स्वाभिमान पर चोट का जब बदला लेने का मन बनाया तो काँग्रेस के किसी भी नेता ने यह नहीं सोचा था कि बात इस हद तक बढ़ जाएगी.
केंद्र में काँग्रेस के कई नेता, पूर्व मुख्यमंत्री, कार्यकारिणी के सदस्य और यहाँ तक कि राज्य के प्रभारी और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री एके एंटनी ने सोनिया गाँधी को बदलते समीकरण की चेतावनी नहीं दी.
लिहाज़ा भारतीय जनता पार्टी जनता दल-सेक्युलर के समर्थन से दक्षिण भारत में पहली बार सत्ता में आने की कोशिश कर रही है.