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इकलौती कन्या को मुफ़्त शिक्षा पर रोक

दिल्ली हाई कोर्ट ने इकलौती कन्या संतान को मुफ़्त शिक्षा देने के आदेश पर रोक लगा दी है.

केंद्र सरकार की घोषणा के बाद सीबीएसई ने 18 अक्टूबर, 2005 को एक आदेश जारी किया था जिसमें सभी मान्यता प्राप्त स्कूलों में ऐसी बालिकाओं को कक्षा छह से आगे मुफ़्त में शिक्षा देने का आदेश दिया था.

न्यायाधीश विक्रमजीत सेन ने शुक्रवार को एक निजी स्कूल की याचिका पर इस मामले में स्थगन आदेश दे दिया था.

उन्होंने इस मामले में सीबीएससी, केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशक से चार सप्ताह में जवाब देने को कहा है.

स्कूल की दलील है कि सीबीएससी का आदेश लिंग के आधार पर भेदभाव, बराबरी के अधिकार का हनन करने वाला और ग़ैरक़ानूनी है.

इस मामले में मॉटरडे स्कूल की प्रिंसपल सिस्टर टर्नी वॉस ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि यह योजना ज़रूरत पर आधारित होनी चाहिए.

उनका तर्क था कि उन बच्चों को मुफ़्त शिक्षा देना ठीक है जो फ़ीस नहीं दे सकते. लेकिन जो लोग फ़ीस दे सकते हैं, उनको यह सुविधा देना ठीक नहीं है.

टर्नी वॉस ने बताया कि उनके स्कूल में 150 इकलौती कन्या हैं और हमारे लिए इन सबकी फ़ीस माफ़ करना मुश्किल है.

सरकार का क़दम

ग़ौरतलब है कि भारत में लगातार गड़बड़ा रहे लिंगानुपात को ठीक करने के लिए सरकार ने फ़ैसला किया था कि यदि परिवार में इकलौती संतान लड़की होगी तो उसे 12वीं तक की शिक्षा मुफ़्त दी जाएगी.

इसके बाद स्नातकोत्तर स्तर तक की शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति दी जाएगी. और यदि परिवार की दोनों संतानों में से दोनों लड़कियाँ हों तो उन दोनों को सभी तरह की फ़ीस में 50 प्रतिशत छूट होगी.

कुछ दिनों पहले ही आँध्र प्रदेश सरकार ने घोषणा की थी कि जिस परिवार में एकलौती संतान लड़की होगी उसे सरकार की ओर से एक लाख रुपए दिए जाएँगे.

इसके अलावा कई राज्यों में लड़कियों की शिक्षा के लिए विशेष प्रोत्साहन योजनाएँ लागू की गई हैं.