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परमाणु समझौते पर सहमति की कोशिश

अमरीका के विदेश उप मंत्री निकोलस बर्न्स ने गुरुवार को विदेश सचिव श्याम सरन से मुलाक़ात की है. दोनों देश एक बार फिर परमाणु समझौते पर सहमति बनाने की कोशिश में लगे हैं.

पिछले साल जुलाई में भारत और अमरीका के बीच असैनिक कार्यों के लिए परमाणु समझौता हुआ था.

दोनों देश राष्ट्रपति बुश की भारत यात्रा को देखते हुए इस मुद्दे पर तत्काल प्रगति चाहते हैं.

लेकिन अब भी दोनों के बीच मतभेद बने हुए हैं. समझौते के तहत भारत को असैनिक और सैन्य परमाणु सुविधाओं की घोषणा करनी है.

असैनिक कार्यों के लिए परमाणु सविधाओं को अमरीका से ईंधन और तकनीकी सहायता मिलेगी. साथ ही इनका अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण भी होगा. लेकिन सैन्य सुविधाएँ निरीक्षण की परिधि से बाहर होंगी.

भारत की अनेक अनुसंधान सुविधाएँ दोनों क्षेत्रों में योगदान देती हैं. इन दोनों को अलग करना आसान नहीं है.

विरोध

एक ओर जहाँ दोनों देशों की सरकारें इस मामले को सुलझाने में लगी हैं, तो दूसरी ओर घरेलू मोर्चे पर इन्हें विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

भारत में वामपंथी इस समझौते पर सवाल खड़ा कर रहे हैं, तो अमरीका में बुश प्रशासन को इसे संसद से पारित करवाना है.

लेकिन विभिन्न कारणों से विरोध के बावजूद दोनों देशों की सरकारें इसे पारित कराने की इच्छुक हैं.

भारत 1998 में परमाणु परीक्षण के बाद लगे प्रतिबंधों से उबरना चाहता है. वह अपने आपको अंतरराष्ट्रीय जगत में एक ज़िम्मेदार परमाणु देश के रूप मे स्थापित करना चाहता है.

दूसरी ओर अमरीका भारत को चीन के मुक़ाबले अपने सहयोगी के रूप में पेश करना चाहता है.

अमरीका चाहता है कि वह इस समझौते की मदद से ईरान के साथ भारत के गैस क्षेत्र में होनेवाले समझौते को किसी तरह रोकने में सफल हो सके.