सोमवार, 02 जनवरी, 2006 को 17:28 GMT तक के समाचार
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में पिछले लगभग दो वर्षों से हिंसा जारी है. यहाँ स्थानीय राष्ट्रवादी कबायली गुट और अधिक राजनीतिक और आर्थिक अधिकार चाहते हैं.
बलूचिस्तान में 1970 के दशक के मध्य भी सशस्त्र विद्रोह हुआ था लेकिन तब ईरान की सहायता से इसे दबा दिया गया.
लेकिन 30 साल बाद वहाँ फिर संघर्ष शुरू हो गया है.
चरमपंथियों के सरकारी कर्मचारियों और प्रतिष्ठानों पर कई बड़े हमलों के बाद पिछले महीने दिसंबर में पाकिस्तानी सुरक्षाबलों ने बलोचिस्तान प्रांत के दो ज़िलों, कोलू और डेरा बुग्ती, में एक बड़ा अभियान चलाया.
चरमपंथियों ने वर्ष 2004 में अपने हमलों में तेज़ी लाई और उस वर्ष विभिन्न झड़पों में 30 से भी अधिक सुरक्षाकर्मी मारे गए.
बलूचिस्तान गैस के भंडार के हिसाब से पाकिस्तान में बड़ा महत्व रखता है और वहाँ सुई नामक जगह पर मिलनेवाली गैस से पूरे पाकिस्तान की आधी से अधिक ज़रूरत पूरी होती है.
चरमपंथियों ने सुई गैस प्रतिष्ठान पर भी हमला किया है.
पंजाबियों का विरोध
बलूचिस्तान में जो संघर्ष हो रहा है उसमें सबसे अधिक नाम बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी नामक गुट का है जो एक नया चरमपंथी गुट है.
सरकार मानती है कि बीएलए अशांति को हवा देती है और बीएलटी भी मानती है कि उसने कई हमले किए हैं.
बलूचिस्तान के पूर्व मुख्यमंत्री नवाब अकबर बुग्ती का कहना है कि बीएलए को लोगों का समर्थन मिला हुआ है.
वे कहते हैं,"सवाल ये नहीं है कि बीएलए जो कर रहा है वो सही है कि ग़लत, सरकार को देखना ये चाहिए कि क्यों बलूचिस्तान में इतने सारे लोग बीएलए के साथ हैं".
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी का कहना है कि वह पंजाबियों के प्रभुत्व का विरोध कर रही है.
उनके अनुसार केंद्र में कामय एक ऐसी सत्ता बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रही है जिसमें पंजाब प्रांत से आए लोगों का ही प्रभाव है.
प्रांत का बुरा हाल
बलूचिस्तान पाकिस्तान के चार प्रांतों में सबसे बड़ा प्रांत है लेकिन वहाँ पाकिस्तान की आबादी के सात प्रतिशत से भी कम लोग रहते हैं.
प्रांत में पाँच प्रतिशत से भी कम लोगों तक नल का पानी पहुँचा है और महिलाओं की साक्षरता की दर केवल 15 प्रतिशत है.
बलूचिस्तान में पानी की निरंतर ख़राब होती व्यवस्था के कारण काफ़ी सारी ज़मीन उजाड़ हो चुकी है जिसे लेकर भी असंतोष है.
प्रशासनिक हिसाब से भी बलूचिस्तान की हालत ख़राब है. प्रांत का 80 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा कबायली क्षेत्र माना जाता है जहाँ विशेष क़ानून लागू हैं जिन्हें स्थानीय लोग पक्षपातपूर्ण मानते हैं.
पुलिस के पास अधिक संसाधन नहीं हैं इलाक़े में अभी भी कई लोग अपना जीवन चोरी-डकैती कर चलाते हैं.
नियंत्रण का अभाव
स्थानीय लोग मानते हैं कि साल दर साल स्थानीय कबायली सरदारों का लोगों पर प्रभाव कम होता गया है.
लेकिन उस सत्ता-शून्यता को पूरा करने के लिए ना तो कोई कुशल प्रशासन है ना ही ऐसे राजनेता जो प्रांत को पाकिस्तान की मुख्यधारा से जोड़ सकें.
बलूचिस्तान की विधानसभा चारों प्रांतों में सबसे खस्ताहाल है.
ऐसे में प्रांत की सारी युवा पीढ़ी, जो बेरोज़गार है और निराश है, वह नेतृत्व विहीन हो चुकी है.
ऐसे में ही कुछ लोगों ने प्रदेश में पंजाबियों के प्रभाव के विरोध में आंदोलन शुरू कर दिया है.