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शनिवार, 31 दिसंबर, 2005 को 11:32 GMT तक के समाचार

विनोद वर्मा
बीबीसी संवाददाता, मुंबई से

आसान नहीं है राजनाथ की डगर

भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने इस वक्तव्य के साथ अध्यक्ष पद छोड़ दिया है कि पिछले 25 सप्ताह उनके लिए कठिनाई से भरे हुए थे.

लेकिन जाते-जाते भी ऐसा कुछ नहीं कर पाए कि नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह को आश्वासन मिल पाता कि ये कठिनाइयाँ दूर हो गई हैं या अब उनके रास्ते में नहीं आएँगी.

इससे साफ़ है कि अध्यक्ष राजनाथ सिंह को वही काँटे एक-एक करके चुनने होंगे जो आडवाणी जी अपने पीछे छोड़ गए हैं.

भाजपा के रजत जयंती समारोह में, पूरे पाँच दिन जिस तरह राजनाथ सिंह पिछली पंक्तियों में छिपे से रहे उसने एक संकेत तो साफ़ दिया कि वह रजत जयंती के दौरान अध्यक्ष पद पर बैठे आडवाणी की पसंद नहीं हैं.

पार्टी के अंदरूनी समीकरणों में वह अटल बिहारी वाजपेयी के सिपहसलार माने जाते हैं और उनके अध्यक्ष बनने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्वीकृति की भी बड़ी भूमिका है.

जैसा कि राजनाथ सिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “अटलजी और आडवाणी जी के बीच जो परस्पर विश्वास और सहयोग रहा है वह प्रेरणादायी है” इससे ज़ाहिर है कि उनके सामने बड़ी चुनौती यही होगी कि पार्टी के दूसरे साथियों को किस तरह साथ लिया जाए.

पार्टी की पहली पीढ़ी ने इस रजत जयंती समारोह के साथ अपनी भूमिका को लगभग समाप्त घोषित कर दिया है लेकिन दूसरी पीढ़ी में अभी ऐसा कोई सर्वमान्य नेता नहीं उभरा है, और इसमें राजनाथ सिंह भी शामिल हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने संन्यास की घोषणा के साथ संकेत दिए कि आने वाले दिनों में पार्टी राम और लक्ष्मण के रूप में आडवाणी और प्रमोद के हाथों में रहेगी. हालाँकि इसका विश्लेषण लोग अपनी-अपनी तरह से कर रहे हैं लेकिन इससे राजनाथ सिंह की स्थिति कुछ कमज़ोर हुई है.

अनुशासन और भ्रष्टाचार

इसके अलावा अभी पार्टी के लिए इस सच्चाई का सामना करना बचा है कि पार्टी के सांसदों को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर संसद ने निष्कासित कर दिया गया है और कुछ और का निकाला जाना तय है.

भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस और उसकी संस्कृति को दोषी ठहराकर पार्टी अपने दामन के दाग़ कांग्रेस के दामन में नहीं फेंके जा सकते, इसे पार्टी के नेता भी जानते हैं और कार्यकर्ता भी.

इन सांसदों की सीटों पर आने वाले दिनों में चुनाव होंगे और वहाँ पार्टी को सार्वजनिक रूप से जवाब देना होगा. यह ज़िम्मेदारी राजनाथ सिंह पर ही होगी.

उमा भारती को अनुशासनहीनता के आरोप में बाहर तो कर दिया गया है लेकिन इससे समस्या ख़त्म हो गई, यह पार्टी भी नहीं कह सकती.

राजनाथ सिंह को आने वाले दिनों में उमा भारती की इस चुनौती का जवाब भी देना होगा कि असली भाजपा किसकी है. उमा भारती की या राजनाथ सिंह की.

11 अशोक रोड, नई दिल्ली पार्टी के लिए सिर्फ़ डाक का पता है, असली पार्टी को तो जनता के बीच ढूँढ़ना होगा, इस तथ्य से राजनाथ सिंह भी नावाकिफ़ नही होंगे.