सोमवार, 26 दिसंबर, 2005 को 12:44 GMT तक के समाचार
विनोद वर्मा
बीबीसी संवाददाता, मुंबई से
पच्चीस बरस की हो गई भारतीय जनता पार्टी का अधिवेशन ऐसे समय में हो रहा है जब पार्टी कई तरह के संकटों का सामना कर रही है.
पार्टी के भीतर सबसे बड़ा संकट इस समय नेतृत्व का है. जैसे कि संकेत मिल रहे हैं पार्टी अब बागडोर नई पीढ़ी को सौंपने को तैयार हो गई है.
यानी लालकृष्ण आडवाणी के जाने के बाद पार्टी में बूढ़े नेताओं की भूमिका सलाहकारों तक सीमित होती दिख रही है. चाहे वो ख़ुद लालकृष्ण आडवाणी हों या फिर मुरली मनोहर जोशी.
अटल बिहारी वाजपेयी तो ख़ैर पहले ही इस भूमिका को स्वीकार कर चुके हैं.
लेकिन इससे दूसरी पंक्ति के नेताओं के बीच लंबे समय से चल रही खींचतान भी ख़त्म ही हो जाएगी यह आश्वासन कोई नहीं दे सकता.
अगर राजनाथ सिंह पार्टी अध्यक्ष बन ही रहे हैं तो उनके ख़िलाफ़ तलवारें अभी से खिंचती नज़र आ रही हैं.
अलग सी पार्टी?
इसके अलावा पार्टी के सामने बड़ा संकट है सिद्धांतों और राजनीतिक रणनीति का.
संघ परिवार ने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि भाजपा को से फिर एक अलग पार्टी यानी कि ‘ए पार्टी विद ए डिफरेंस’ बनने की कोशिश करनी चाहिए.
संघ का मानना है कि पार्टी ने सत्ता पाने के लिए सिद्धांतों से समझौता कर लिया है और ये संघ को मंज़ूर नहीं है.
संकेत साफ़ हैं कि संघ भाजपा को हिंदुत्व के एजेंडे पर वापस लौटते देखना चाहती है लेकिन भाजपा को इसके लिए एनडीए गठबंधन के साथियों को अलविदा कहना होगा, जो कि ज़ाहिर है एक कठिन राजनीतिक निर्णय होगा.
यह फ़ैसला शायद ‘राम’ और समान आचार संहिता को छोड़ने से भी कठिन होगा क्योंकि इससे सत्ता पाने का रास्ता न केवल केंद्र में बल्कि कई राज्यों में भी और कठिन हो जाएगा.
अनुशासन?
तीसरी समस्या अनुशासन की है. उमा भारती ने पार्टी आलाकमान के ख़िलाफ़ जिस तरह बाग़ी तेवर अपनाए हैं उसने पार्टी के आधारभूत ढाँचे को हिला दिया है.
वर्ष 2004 के नवंबर से लेकर वर्ष 2005 के नवंबर तक उमा भारती ने एकाधिक बार पार्टी नेतृत्व को चुनौती दी और अब आखिरकार पार्टी से निकाल दी गई हैं.
लेकिन इससे मामला ख़त्म नहीं हो गया है. उमा भारती की जनता के बीच एक साख है और उनको लेकर पार्टी के एक वर्ग में बड़ी सहानुभूति है. कई राजनीतिक विश्लेषक इसे पार्टी में विभाजन की परिस्थितियों की तरह भी देखते हैं.
और आख़िरी संकट है हाल ही में संसद में प्रश्न पूछने के लिए पैसा लिए जाने के मामले में पार्टी के सबसे अधिक सांसदों के पकड़े जाने का. हालाँकि लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में पार्टी ने उन सभी सांसदों को संसद से निष्कासित किए जाने का विरोध किया है लेकिन पार्टी को अहसास है कि जनता संसद के इस फैसले से ख़ुश है और पार्टी के विरोध के संकेत कोई बहुत अच्छे नहीं जा रहे हैं.
इस समय पाँच राज्यों में शासन कर रही भाजपा के पास हाल ही में बिहार में सत्ता में भागीदारी निभाने का मौक़ा हाथ आया है.
पार्टी के सामने एक चुनौती तो इन राज्यों में अनुशासन बनाए रखते हुए ‘सुशासन’ प्रदान करने की है और फिर तीन राज्यों पश्चिम बंगाल, केरल और असम में आने वाले चुनावों की तैयारियाँ करनी है.
इस बीच उसे अपने सबसे पुराने और स्वाभाविक सहयोगी दल शिवसेना में हो रही टूट-फूट की राजनीतिक सच्चाई को भी बर्दाश्त करना है.
कहना कठिन है कि इस रजत जयंती समारोह से लौटते हुई भाजपा अपने साथ इन संकटों का कितना समाधान अपने साथ दिल्ली ले जा पाएगी लेकिन इस वक़्त तो पार्टी मान ही रही है कि ‘सब कुछ ठीक हो जाएगा’.