शुक्रवार, 23 दिसंबर, 2005 को 13:48 GMT तक के समाचार
देवदत्त
राजनीतिक विश्लेषक
लोकसभा का यह फ़ैसला राजनीतिक वर्ग का कायाकल्प कर देगा है और यह संसदीय इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा.
अभी तक राजनीतिक वर्ग की यही मानसिकता थी कि भ्रष्टाचार दूसरों की समस्या है, हम इससे परे हैं. हमारे भ्रष्ट होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है.
सन् 1950 से राजनेता यही सोचते आए हैं कि हमें तो कोई नहीं पकड़ सकता. अब यह अवधारणा बदली है.
इससे पहले इससे लड़नेवाला केवल एक ही सिपाही माना जाता था और वह थी न्यायपालिका.
राजनीतिक वर्ग पर न्यायपालिका की ओर से जब-जब सवाल उठे, उन्होंने यही कहा कि न्यायपालिका को हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है.
पर इस घटनाक्रम के बाद पहली बार राजनीतिक वर्ग ने माना है कि वे भी भ्रष्ट हो सकते हैं.
राजनीतिक वर्ग की यह मानसिकता प्रारंभ से ही रही है. तब से लेकर अबतक तमाम मामलों में राजनीतिक वर्ग ने अपने लोगों को बचाए रखा.
पहली बार उन्होंने अपनी छवि पर उंगली उठती देखकर उसे स्वीकार किया है.
भाजपा का रुख़
भाजपा इस पूरे प्रकरण का यह कहकर विरोध कर रही है कि इन सांसदों को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया.
मैं इससे सहमत नहीं हूँ क्योंकि संसदीय समिति ने इन सांसदों को मौका दिया था. अब सदन फिर से मौका क्यों दे. समिति भी तो सदन की ही थी.
असल बात तो यह है कि भाजपा की ऐसी सामाजिक-आर्थिक मानसिकता ही रही है जिसमें 'नैनं छिदंति शस्त्राणि' वाला भाव है.यानी कुछ भी करें, आत्मा पवित्र है इसलिए अपराध-बोध जैसा कुछ नहीं है.
यह भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की देन है.
मज़बूती
इस फ़ैसले से प्रजातंत्र मज़बूत हुआ है और आम जनमानस को एक आश्वासन मिला है कि संसद में बैठे लोगों को भी रोका जा सकता है.
साथ ही सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस फ़ैसले के बाद लोगों का विश्वास संसद पर और बढ़ गया है.
जनता को सीधा लाभ तो नहीं हुआ है पर एक आश्वासन ज़रूर मिला है. सांसदों में एक तरह की दहशत है और इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक लाभ केंद्र की यूपीए सरकार को मिलेगा.
इससे पहले लोगों को लगता था कि केवल सुप्रीम कोर्ट ही एकमात्र सहारा है जो जनहितों को ध्यान में रखेगा पर इससे संसद पर भी लोगों की नज़र गई है और लोगों को लग रहा है कि संसद से भी सुधार की आशा की जा सकती है.
मीडिया का संकट
एक चिंता और भी है और वह है इस घटनाक्रम से मीडिया के बारे में उपजे सवालों पर बहस की.
ख़तरे की बात यह है कि मीडिया या उसके बाहर इस बारे में न तो कोई चर्चा हुई है और न ही इसके प्रति कोई गंभीर है.
खोजी पत्रकारिता की सीमारेखा को तय कर पाना मुश्किल है क्योंकि जब भ्रष्टाचार की ही कोई सीमा नहीं रही तो फिर पत्रकारिता से ऐसी अपेक्षा क्यों है कि वह भी अन्वेषण के लिए बनाए गए सरकारी ढांचों की तरह एक तय ढर्रे पर चले.
हाँ, इससे एक संकट और पैदा हो सकता है और उसे वह वर्ग पैदा कर सकता है जो पत्रकारिता में नहीं है. वह इस तरह की पत्रकारिता कर राजनीतिक लाभ कमा सकता है.
पत्रकारिता के तमाम संस्थानों और मंचों पर इस बारे में न तो कोई चर्चा है और न ही उन्हे यह सवाल नज़र आ रहा है जो चिंताजनक है.